गुमनामी से बदनामी भला
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बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद ” की कलम से
बदलते रिश्तो की कहानी – ये कहानी एक भाई की कहानी है जैसा की आज का माहौल है की शादी के बाद बेटी परायी हो या न हो लेकिन बेटे को जरुर पराया समझ लिया जाता है-

शाम धीरे-धीरे अपने आँचल में पूरे मोहल्ले को समेट रही थी। दिनभर की चहल-पहल अब सन्नाटे में बदलने लगी थी। दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और गली में खेलते बच्चों की आवाज़ें भी अब कम हो चुकी थीं। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी, लेकिन उस घर के बरामदे में माहौल बिल्कुल उल्टा था। वहाँ गर्मी मौसम की नहीं, रिश्तों की थी।
घर के बाहर रखी पुरानी कुर्सी पर शेखर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर दिनभर की मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसकी नज़रें सामने सड़क पर थीं, लेकिन मन शायद कहीं और भटक रहा था। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसके अपने ही घर के अंदर कुछ ऐसा होने वाला है, जो आने वाले समय में पूरे परिवार के रिश्तों की दिशा बदल देगा।
घर के अंदर अपने कमरे में समर किसी जरूरी काम में व्यस्त था। उसके सामने खुला लैपटॉप था और पास ही कुछ कागज़ रखे थे। वह पूरी कोशिश कर रहा था कि अपना काम समय पर पूरा कर ले। बाहर से आती आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं, लेकिन उसने सोचा कि घर की छोटी-मोटी बात होगी और थोड़ी देर में सब शांत हो जाएगा।
बरामदे में स्वाति और साक्षी आमने-सामने खड़ी थीं।
दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहस शुरू हो चुकी थी।
शुरुआत में आवाज़ें धीमी थीं, लेकिन देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि घर की दीवारें भी जैसे उन शब्दों की गवाह बन गईं।
साक्षी ने गुस्से में कहा,
“आप अपने काम से काम रखिये, मेरी माँ बनने की कोशिश मत करो।”
उसकी आवाज़ में सम्मान से ज़्यादा तकरार थी।
स्वाति ने अपने गुस्से को दबाते हुए शांत स्वर में कहा,
“देखो साक्षी, मैं तो बस तुम्हे समझा रही थी, की पढ़ाई पर ध्यान दो, इन फालतू के चक्करों में मत पड़ो।”
वह डाँटना नहीं चाहती थी। वह केवल इतना चाहती थी कि साक्षी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। उसे लगता था कि अगर आज नहीं समझाया गया, तो कल देर हो जाएगी।
लेकिन साक्षी उस समय समझने के मूड में बिल्कुल नहीं थी।
उसने तुरंत जवाब दिया,
“मुझे पता है की मुझे क्या करना है क्या नहीं, इसलिए आप चुप ही रहो।”
उसकी बात सुनकर स्वाति कुछ पल के लिए शांत हो गई।
कभी-कभी सामने वाले का गुस्सा देखकर इंसान खुद को रोक लेता है, लेकिन जब बात अपने परिवार की इज़्ज़त और भविष्य की हो, तब चुप रहना भी आसान नहीं होता।
स्वाति ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की।
“हाँ मुझे पता है की तुम्हे सही गलत की समझ है, अभी पेपर आने वाले है तो उस पर ध्यान देने की बजाय तुम…. खैर छोड़ो, कम से कम पापा के बारे में सोचो, अपने भाई के बारे में सोचो, इनकी बदनामी तो मत कराओ, कितने मेहनत से पैसे कमाकर तुम्हारी पढ़ाई में लगा रहे है।”
कमरे के अंदर बैठा समर अब सब कुछ साफ-साफ सुन रहा था।
उसने अपने हाथ रोक दिए। कुछ पल तक वह कुर्सी पर बैठा रहा।
उसने सोचा…
“दोनों समझदार हैं। थोड़ी देर में मामला शांत हो जाएगा।”
लेकिन अगले ही पल उसे स्वाति की आवाज़ फिर सुनाई दी। इस बार आवाज़ पहले से ज़्यादा तेज़ थी।
समर ने गहरी साँस ली, अपना काम अधूरा छोड़ दिया और कमरे से बाहर निकल आया।
उसे देखते ही स्वाति ने राहत की साँस ली।
“अब आप ही समझाओ इसे।”
लेकिन साक्षी का गुस्सा अब तक ठंडा नहीं हुआ था। उसने बिना रुके कहा,
“देखो मुझे किसी से कुछ नहीं समझना और जो आप कह रही हो न की सारी कमाई मेरे पढ़ाई में लगा देते है तो ऐसा कुछ नहीं है, मैं अपने पापा के पैसे से पढ़ रही हूँ, और पापा ने ही तो इन्हें पढ़ाया है न, अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”
ये शब्द सुनते ही समर जैसे भीतर तक काँप गया।
उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही साक्षी है, जिसे उसने बचपन से गोद में खिलाया, जिसके लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ छोड़ीं, जिसकी हर ज़िद पूरी करने की कोशिश की…
आज वही बहन उसके लिए “एहसान” शब्द का इस्तेमाल कर रही थी।
कुछ रिश्ते टूटते नहीं…
लेकिन एक वाक्य उन्हें पहले जैसा भी नहीं रहने देता।
समर कुछ कहना चाहता था। उसके होंठ खुले ही थे कि तभी स्वाति बोल पड़ी।
“देखो तुम्हे अपने भैया से इस तरह से बाते नहीं करनी चाहिए, तुम्हारी जुबान कुछ ज्यादा ही चलने लगी है, मेरी बहन होती तो अभी पीट कर रख देती।”
यह सुनते ही साक्षी का गुस्सा पूरी तरह फूट पड़ा।
उसने चुनौती भरे स्वर में कहा, “हाँ तो मारो न, मारो मुझे।”
इतना कहते हुए उसने स्वाति को ज़ोर से धक्का दे दिया। स्वाति अपना संतुलन नहीं संभाल सकी।
वह पीछे जाकर दीवार से टकरा गई। एक पल के लिए पूरा घर जैसे थम गया।
समर ने जब अपनी पत्नी को दीवार से टकराते देखा, तो उसके भीतर का धैर्य टूट गया। उसने बिना कुछ सोचे आगे बढ़कर साक्षी के गाल पर एक थप्पड़ मार दिया।
थप्पड़ की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
और उसी आवाज़ के साथ जैसे इस घर की शांति भी टूट गई। बाहर बैठे शेखर ने जैसे ही थप्पड़ की आवाज़ सुनी, वह तुरंत उठकर अंदर आया।
उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। बरामदे में पहुँचते ही उसने ऊँची आवाज़ में पूछा,
“क्या तमाशा बना रखा है तुम लोगो ने?”
समर जल्दी से बोला,
“पापा मैं बताता हूँ वो साक्षी ने स्वाति को…”
लेकिन शेखर ने उसकी बात पूरी होने ही नहीं दी।
उसने गुस्से में कहा,
“क्या सुनूँ मैं तुम्हारी, जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”
ये शब्द समर के सीने में किसी तीर की तरह जाकर लगे।
उसे उम्मीद थी कि पापा पहले पूरी बात सुनेंगे।
लेकिन फैसला तो उसकी बात पूरी होने से पहले ही सुनाया जा चुका था।
समर ने खुद को संभालते हुए कहा,
“पापा वो मेरी भी बहन है और उसने स्वाति के साथ बदतमीज़ी की, वो तो उसे बस समझा रही थी।”
शेखर का चेहरा और सख्त हो गया। उसने उँगली दिखाते हुए कहा,
“चुप एकदम चुप, आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा, अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट, आयी बात समझ में।”
यह पहली बार था…
जब समर को महसूस हुआ कि वह अपने ही घर में किसी पराए की तरह खड़ा है। जिस पिता ने कभी उसी पर भरोसा करके अपनी बेटी की जिम्मेदारी उसे सौंपी थी…
आज वही पिता उसे अपनी बहन से दूर रहने का हुक्म दे रहे थे।
समर ने एक बार साक्षी की तरफ देखा। फिर अपने पिता की ओर। उसने कुछ कहना चाहा…
लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।
कुछ रिश्ते आवाज़ से नहीं…
खामोशी से टूटते हैं।
वह बिना कुछ बोले अपने कमरे की ओर चल पड़ा।
उसके कदम भारी थे।
कमरे का दरवाज़ा बंद करते ही वह बिस्तर पर बैठ गया। कमरे में सन्नाटा था…
लेकिन उसके भीतर यादों का शोर उठने लगा था। उसे याद आने लगा…
एक समय ऐसा भी था, जब यही साक्षी उसकी दुनिया की सबसे प्यारी ज़िद हुआ करती थी…
जिसकी हर मुस्कान के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था…
और उसके पापा…
वो भी तब हर बात पर यही कहते थे—
“समर… अब तू ही इसे समझा सकता है।”
यादों का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा…
और समर का मन कई साल पीछे लौट गया…
कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही समर बिस्तर के किनारे बैठ गया। बाहर बरामदे में अभी भी धीमी-धीमी आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उसके कान अब कुछ सुन नहीं रहे थे। शेखर के शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह गूँज रहे थे।
“जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”
समर ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।
आँखें बंद होते ही वर्तमान की कड़वी सच्चाई धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगी और बीते हुए दिनों की मीठी यादें उसके सामने जीवित होने लगीं।
उसे याद आया… एक समय ऐसा भी था, जब इस घर में झगड़ों की जगह हँसी गूँजा करती थी। हर शाम इसी आँगन में सब लोग साथ बैठते थे। शेखर की डाँट में भी अपनापन होता था और साक्षी की जिद पूरे घर को मुस्कुराने पर मजबूर कर देती थी।
उसी समय की एक तस्वीर उसकी आँखों के सामने उभर आई।
रसोई से गरम-गरम खाने की खुशबू आ रही थी। खाने की मेज़ पर समर और साक्षी साथ बैठे थे। दोनों खाते कम और एक-दूसरे की खिंचाई ज़्यादा कर रहे थे।
साक्षी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा,
“भैया इस बार मेरे बर्थडे पर एक अच्छी सी ड्रेस दिलाएगा क्या?”
समर ने उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराकर पूछा,
“किस तरह की ड्रेस चाहिए बता।”
साक्षी की आँखों में चमक आ गई।
“कुछ अलग तरह की जो अभी तक नहीं पहनी, जैसे फिल्मो में पहनते है।”
समर ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया और बोला,
“ठीक है इस बार चुड़ैल वाली ड्रेस लाता हूँ वो तूने अभी तक नहीं पहनी है।”
बस फिर क्या था…
साक्षी ने तुरंत मुँह फुला लिया।
“भैया मजाक मत करो, मैं क्या चुड़ैल लगती हूँ, ठीक है भाभी को आने दो फिर देखूंगी उन्हें कौन से चुड़ैल वाली ड्रेस लाकर दोगे।”
इतना सुनते ही समर ज़ोर से हँस पड़ा।
साक्षी ने गुस्से का नाटक करते हुए रोटी का छोटा-सा टुकड़ा उसकी तरफ फेंक दिया।
दोनों की नोकझोंक देखकर शेखर भी मुस्कुरा दिए।
उस दिन घर की दीवारों पर केवल हँसी गूँज रही थी।
समर ने कभी महसूस ही नहीं किया था कि वही छोटी-सी लड़की, जो हर बात पर उससे रूठ जाती थी, एक दिन उसी से इतनी दूर हो जाएगी।
यादों का सिलसिला यहीं नहीं रुका।
एक और घटना उसके सामने चलचित्र की तरह घूमने लगी।
उस दिन दोपहर का समय था। समर घर पर बैठा कुछ काम कर रहा था। तभी उसका फोन बजा। उसने फोन उठाया और सामने वाले की पूरी बात सुनने के बाद केवल इतना कहा,
“ठीक है आने दो फिर बताता हूँ।”
फोन रखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। वह चुपचाप दरवाज़े की तरफ देखने लगा। कुछ देर बाद साक्षी घर के अंदर आई। उसे देखते ही समर ने पूछा,
“कहाँ थी अब तक?”
साक्षी ने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा,
“कही नहीं भैया, वो सहेली के साथ थोडा रुक गयी थी इसलिए लेट हो गयी।”
समर उसकी आँखों को पढ़ रहा था।
उसे साफ महसूस हो रहा था कि साक्षी कुछ छिपा रही है।
उसने पास रखी एक छड़ी उठाई और गंभीर आवाज़ में कहा,
“सच बता कहाँ थी और क्या कर रही थी।”
साक्षी का चेहरा उतर गया। तभी बाहर से शेखर अंदर आए। उन्होंने दोनों को देखा और पूछा,
“क्या हुआ समर, क्या किया इसने?”
समर ने बिना कुछ छिपाए सारी बात बता दी।
“पापा इसी से पूंछो कहाँ थी अब तक, स्कूल से छुट्टी करके लड़को के साथ घूमने गयी थी, और किसी से झगड़ा करके आयी है।”
शेखर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उन्होंने तुरंत कहा,
“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी, जितना छूट दिया है उतना ही बिगड़ जा रही है, और पूरी कर सारी फरमाइश।”
साक्षी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह रोते हुए बोली,
“सॉरी पापा वो मेरी सहेली ने बोला की चल आज तुझे अपने घर घुमा के लाती हूँ, उसके दोस्त थे तो वो रास्ते में लड़ाई करने लगे, मैंने कुछ नहीं किया।”
शेखर ने उसकी बात सुनी और बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए। अब घर में केवल समर और साक्षी रह गए थे।
साक्षी सिर झुकाए खड़ी थी।
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
वह धीरे से समर के पास आई और बोली,
“सॉरी भैया आगे से किसी के साथ नहीं जाउंगी।”
समर का गुस्सा उसी पल पिघल गया।
उसने छड़ी एक तरफ रख दी।
फिर साक्षी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला,
“ठीक है आज छोड़ रहा हूँ लेकिन आगे से अगर कुछ सुन लिया न तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
साक्षी ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
कुछ ही पल बाद उसने धीरे से समर का हाथ पकड़ लिया।
जैसे वह कह रही हो…
“मुझसे गलती हो गई भैया… लेकिन मुझसे नाराज़ मत होना।”
उस दिन समर ने उसे डाँटा ज़रूर था, लेकिन उस डाँट में एक बड़े भाई की चिंता थी।
और सबसे बड़ी बात…
उस दिन शेखर ने एक बार भी यह नहीं कहा था कि “मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”
उल्टा… उन्होंने खुद समर से कहा था,
“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी।”
यही बात आज समर के दिल को सबसे ज़्यादा चुभ रही थी। आखिर ऐसा क्या बदल गया था?
वह तो आज भी वही भाई था… साक्षी भी वही बहन थी…
शेखर भी वही पिता थे…
फिर रिश्तों के मायने अचानक कैसे बदल गए? समर की आँखों से एक आँसू निकलकर उसके हाथ पर गिरा।
उसने धीरे से उसे पोंछ लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दर्द इस बात का ज़्यादा था कि साक्षी बदल गई…
या इस बात का कि उसके अपने पिता बदल गए।
कमरे के बाहर रात गहराने लगी थी। लेकिन समर के भीतर यादों की सुबह अभी भी जाग रही थी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि यह तो बस शुरुआत थी…
रिश्तों की असली परीक्षा अभी बाकी थी।
समर की आँखें अब भी खुली थीं, लेकिन उसकी नज़रें कमरे की दीवार पर टिकी हुई थीं। बाहर रात पूरी तरह उतर चुकी थी। बरामदे में फैला सन्नाटा बता रहा था कि झगड़ा तो खत्म हो गया है, लेकिन उस झगड़े की गूँज अभी भी घर की दीवारों में कैद थी।
उसी समय दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
स्वाति धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।
उसके चेहरे पर भी उदासी साफ दिखाई दे रही थी। दीवार से टकराने की वजह से उसके हाथ पर हल्की-सी चोट भी आ गई थी, लेकिन शायद उस चोट से ज़्यादा दर्द उसे समर की खामोशी का हो रहा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले बैठे रहे। खामोशी कभी-कभी शब्दों से कहीं ज़्यादा बोलती है।
आख़िरकार स्वाति ने धीरे से कहा,
“खाना लगा दूँ?”
समर ने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा,
“भूख नहीं है।”
स्वाति उसके सामने आकर बैठ गई।
वह जानती थी कि समर भूख की वजह से नहीं, बल्कि अपने टूटे हुए मन की वजह से मना कर रहा है।
उसने धीमे स्वर में कहा,
“इतना मत सोचिए… जो हुआ उसे भूल जाइए।”
समर हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी हुई थी।
उसने पहली बार स्वाति की तरफ देखा और बोला,
“कैसे भूल जाऊँ?”
“जिस बहन को बचपन से अपनी बेटी की तरह संभाला… आज उसी के लिए मैं दुश्मन बन गया।”
कुछ पल रुककर उसने फिर कहा,
“और पापा…”
बस इतना कहकर वह चुप हो गया।
शायद उसके पास शब्द तो थे, लेकिन हिम्मत नहीं थी।
स्वाति उसकी मनःस्थिति समझ रही थी।
उसने धीरे से कहा,
“अब उन्हें समझाने का कोई फायदा तो है नहीं, करने दो जैसा उनका दिल करे, सुना नहीं पापा ने क्या कहा की मेरी बेटी को कुछ कहने की जरुरत नहीं है।”
समर ने गहरी साँस ली।
“यही बात तो समझ नहीं आ रही…”
“जब साक्षी छोटी थी, तब उसकी हर गलती पर पापा मुझे ही बुलाते थे। कहते थे— ‘समर, इसे समझा… इसे डाँट… इसे सही रास्ता दिखा।’ और आज…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“आज वही पापा कह रहे हैं कि मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कुछ देर बाद समर उठकर खिड़की के पास चला गया। बाहर आँगन में शेखर अब भी उसी कुर्सी पर बैठे थे। उनके चेहरे पर भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
समर उन्हें देखता रहा। उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—
“क्या सच में पापा बदल गए हैं… या फिर मैं ही बदल गया हूँ?”
उसे याद आया…
माँ के जाने के बाद इस घर में कितनी जिम्मेदारियाँ अचानक उसके कंधों पर आ गई थीं।
साक्षी तब बहुत छोटी थी।
स्कूल छोड़ने से लेकर उसकी किताबें खरीदने तक…
बीमार होने पर रातभर उसके सिरहाने बैठने से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ज़िद पूरी करने तक…
समर ने कभी यह नहीं सोचा कि वह उसका भाई है या पिता। उसे सिर्फ इतना पता था कि साक्षी खुश रहनी चाहिए। कई बार उसने अपनी जरूरतें टाल दी थीं, लेकिन साक्षी की जरूरत कभी नहीं टाली। जब पहली बार साक्षी ने साइकिल सीखने की ज़िद की थी, तब भी समर ही उसे मैदान ले गया था।
जब परीक्षा में कम नंबर आए थे, तब भी पापा के गुस्से से उसी ने उसे बचाया था। जब रात में बुखार आया था, तब भी पूरी रात उसी ने जागकर बिताई थी।
उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब भाई से बढ़कर उसकी जिम्मेदारी बन गई। लेकिन आज…
आज उसी बहन की जुबान से निकले शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे—
“अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”
समर ने आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी इंसान को परायों की बातें उतनी तकलीफ़ नहीं देतीं…
जितनी अपनों की एक बात दे जाती है। उसी समय बाहर से साक्षी के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।
समर ने पलटकर देखा। वह कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा।
उसके मन में गुस्सा नहीं था। अगर कुछ था… तो केवल दुख।
दुख इस बात का कि जिस रिश्ते में कभी शिकायतें भी प्यार से खत्म हो जाती थीं, आज उसी रिश्ते में अहंकार ने जगह बना ली थी।
स्वाति उसके पास आकर खड़ी हो गई। उसने धीरे से समर के कंधे पर हाथ रखा।
समर ने उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
“स्वाति… क्या सच में शादी के बाद बेटा बदल जाता है?”
स्वाति ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने बस इतना कहा,
“नहीं… बेटा नहीं बदलता।”
“बस कुछ लोगों की नज़र बदल जाती है।”
यह सुनकर समर कुछ नहीं बोला।
उसने एक बार फिर बाहर बैठे शेखर की तरफ देखा।
उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि इस घर में शुरू हुई यह दूरी आने वाले दिनों में रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा बनने वाली है।
रात और गहरी होती जा रही थी।
लेकिन इस घर के रिश्तों पर छाया अँधेरा अभी बाकी था…
रात किसी तरह बीत गई, लेकिन उस घर में किसी की नींद पूरी नहीं हुई।
समर देर रात तक करवटें बदलता रहा। कभी वह छत को देखता, कभी आँखें बंद कर लेता। लेकिन जैसे ही आँखें बंद होतीं, पापा के वही शब्द उसके कानों में गूँजने लगते—
“आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा। अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट।”
उधर स्वाति भी जाग रही थी। वह कई बार समर से कुछ कहना चाहती थी, लेकिन हर बार उसके होंठ खामोश रह जाते। वह जानती थी कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन पर शब्द नहीं, केवल समय मरहम लगा सकता है।
सुबह की पहली किरण के साथ घर में हलचल शुरू हो गई।
रसोई में बर्तनों की आवाज़ आने लगी। चाय की खुशबू पूरे घर में फैल गई, लेकिन उस खुशबू में अपनापन कहीं खो गया था।
समर रोज़ की तरह तैयार होकर बाहर आया। बरामदे में शेखर अख़बार पढ़ रहे थे। समर कुछ पल उनके सामने खड़ा रहा।
उसका मन हुआ कि वह आगे बढ़कर कहे—
“पापा… मेरी पूरी बात तो सुन लेते।”
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।
जिस इंसान ने बिना सुने फैसला सुना दिया हो, उसके सामने सफाई देने का क्या मतलब?
वह चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गया। स्वाति ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाय रख दी।
दोनों की नज़रें मिलीं।
उन नज़रों में हजारों बातें थीं, लेकिन दोनों खामोश रहे। इतने में साक्षी अपने कमरे से बाहर आई।
उसने एक बार भी समर की तरफ नहीं देखा। जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।
वह सीधे शेखर के पास जाकर बैठ गई। शेखर ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा,
“अब ठीक है न बेटा?”
साक्षी ने धीरे से सिर हिला दिया।
समर यह सब देख रहा था।
उसने मन ही मन सोचा—
“कल गलती किसकी थी, यह शायद अब मायने ही नहीं रखता।”
कुछ देर बाद शेखर ने स्वाति की तरफ देखते हुए कहा,
“नाश्ता तैयार है कि नहीं?”
स्वाति बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।
पहले ऐसा नहीं था।
पहले शेखर मुस्कुराकर पूछते थे—
“बहू… आज क्या बनाया है?”
लेकिन आज आवाज़ में अपनापन नहीं, केवल औपचारिकता थी।
समर के लिए यह बदलाव नया नहीं था।
वह पिछले कुछ महीनों से यह सब महसूस कर रहा था।
बस… कल पहली बार यह बदलाव शब्दों में बदल गया था।
नाश्ते के दौरान पूरे घर में अजीब-सी खामोशी थी। पहले इसी मेज़ पर बैठकर हँसी-मज़ाक होता था। साक्षी कभी समर की प्लेट से पराठा उठा लेती, तो कभी उसकी चाय पी जाती।
और समर हर बार उसे डाँटने का नाटक करता। आज वही मेज़ चार लोगों के बीच बैठी चुप्पी को देख रही थी। नाश्ता खत्म करके समर उठने लगा।
तभी शेखर की आवाज़ आई।
“समर…”
समर के कदम रुक गए।
उसे लगा शायद पापा अब कल की बात करेंगे। शायद अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ होगा।
वह मुड़ा। शेखर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,
“ऑफिस जाते समय साक्षी की कॉलेज की फीस जमा कर देना।”
समर ने केवल इतना कहा,
“ठीक है पापा।”
बस…
इतनी ही बात हुई। न कल का जिक्र… न थप्पड़ का… न उस बहस का…
और न ही उस दर्द का, जो कल पूरे घर में फैल गया था।
समर ने अपना बैग उठाया और बाहर निकल गया। गली में चलते हुए उसे एहसास हुआ कि इंसान जब बाहर हारता है तो फिर भी लड़ लेता है।
लेकिन जब अपने ही घर में हारने लगे…तो लड़ने की ताकत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
रास्ते भर उसका मन अशांत रहा। ऑफिस पहुँचने के बाद भी उसका ध्यान काम में नहीं लगा। लैपटॉप खुला था, फाइलें सामने थीं, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था। साक्षी का स्वाति को धक्का देना…
उसका थप्पड़… और फिर…
शेखर का बिना कुछ सुने उसे दोषी ठहरा देना। उसने कुर्सी पर सिर टिकाया और गहरी साँस ली।
उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—
“क्या अब मुझे सचमुच साक्षी को कुछ नहीं कहना चाहिए?”
“अगर कल वह कोई और बड़ी गलती कर बैठी… तब भी नहीं?”
“क्या बड़े भाई का रिश्ता केवल शादी तक ही रहता है?”
इन सवालों का जवाब उसके पास नहीं था।
लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हो रहा था कि अगर आज वह चुप हो गया…
तो शायद आगे चलकर यह चुप्पी पूरे परिवार पर बहुत भारी पड़ेगी।
उसे नहीं मालूम था कि आने वाले दिनों में साक्षी की ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है, जहाँ उसे सबसे ज़्यादा उसी भाई की जरूरत पड़ेगी…
जिसे आज उससे दूर रहने की हिदायत दी गई थी।
और शायद…
तब तक बहुत देर हो चुकी होगी…
तो ये कहानी थी “पापा वो मेरी भी बहन है ” , आप लोगो को कैसी लगी अपना प्यार जरूर दे
लेखक & कवि – बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद”
पापा, वो मेरी भी बहन है | बदलते रिश्तों की एक भावुक कहानी Read More »
सीन -1
शाम
का समय है घर के बरामदे में पति पत्नी और उनका एक 8-10 साल का बच्चा है .
तीनो आपस में बहस कर रहे है , पति बच्चे के हाथ से मोबाईल छीनता है और एक थप्पड़ लगाता है ,बच्चा रोने लगता है और मोबाईल उठाकर जमीन पर पटक देता है
फ़्लैश बेक
सुबह का समय है रश्मि टिफिन तैयार कर रही है , रोहित ऑफिस के लिए तैयार हो रहा है
नीचे एक 4-5 साल का बच्चा खेल रहा है और फिर रोने लगता है , रश्मि उसको मोबाईल पकड़ा देती है बच्चा चुप हो जाता है ,
रश्मि –(दीपक को टिफिन पकड़ाते हुए ) अच्छा सुनो शाम को आते हुए पनीर लेते आना, आज आपकी मनपसंद सब्जी बनाउंगी ,
दीपक – (थोडा रोमांटिक होते हुए ) तुम तो जो भी बना दो वही मेरी मनपसंद हो जाती है और उसे किस करने के लिए आगे बढ़ता है
रश्मि – क्या कर रहे हो मुन्ना बड़ा हो गया है सब देख रहा है .
दीपक – अरे जाने मन वो तो मोबाईल में बिजी है , तुम भी न बस
रश्मि हाथो से धक्का देते हुए ठीक है अभी जाओ ……
दीपक चला जाता है , रश्मि घर के कामो में व्यस्त हो जाती है और काफी समय बीत जाता है , बच्चा मोबाइल में विडिओ देख रहा होता है .
घडी की सुई 10 से 12 बजे पर आती है , रश्मि बच्चे के पास जाती है उसे कुछ खाने को देती है – मेरे मुन्ना को भूख लगी होगी , उसके हाथ से मोबाइल लेती है और उसे खिलाने लगती है तभी डोर बेल बजती है. रश्मि जाकर दरवाजा खोलती है ..उसकी पड़ोसन रज्जो घर के अन्दर घुसते हुए –
रज्जो – रश्मि अभी तक तुम्हारा घर का काम पूरा नहीं हुआ क्या
रश्मि – अभी जाकर खत्म हुआ है , सारे बर्तन , कपडे पोछा ….. बहुत सारा काम हो जाता है
रज्जो – अरे तुमने सुना नहीं बगल वाली के घर में काम वाली का न चक्कर –
(तभी मुन्ना रश्मि के पास आता है और कुछ बोलने की कोशिस करता है )
रश्मि – मुन्ना को चुप कराते हुए दूर करती है – हां हां बोल न चक्कर
रज्जो – बगल वाली जो है न उनके पति का चक्कर
(फिर मुन्ना आकर डिस्टर्ब करता है , रश्मि उसे फिर दूर करती है और उसे मोबाइल देकर दूर बिठा देती है )
रज्जो- बगल वाली के पति का चक्कर उसके काम वाली के साथ चल रहा है
(दोनों काफी देर तक गप्पे मारते है , उधर मुन्ना मोबाइल में व्यस्त रहता है ,घडी की सुई 4 बजा रही होती है )
सीन -2
दीपक – आज ऑफिस जाने का मन नहीं है , थोडा सा काम है तो घर से ही कर लूँगा .
रश्मि – ठीक है मैं तब तक सारा काम निपटा देती हूँ
दीपक लैपटाप पर काम करने लगता है , मुन्ना आकर उसकी फ़ाइल को उठाता है ,
दीपक – उसे प्यार से उठाते हुए ,बेटा अभी ये तुम्हारे काम की नहीं है जब काम की होगी न तो हाथ भी नही लगाओगे . (दीपक उसे दूर बिठा देता है )
थोड़ी देर बाद आकर बच्चा फिर डिस्टर्ब करता है , दीपक कुछ गुस्सा होता है फिर उसे मोबाईल पकड़ा देता है
सीन -3
रश्मि घर के बाहर झाड़ू लगा रही होती है , मुन्ना बाहर ही खेल रहा होता है , सामने से रज्जो मटकते हुए आती है ,
रश्मि – क्या बात है रज्जो आज इतनी जल्दी , काम वाम नही था क्या ?
रज्जो – अरे नहीं दीदी आज मेरे पति और सास ससुर किसी काम से बाहर से गये हुए है शाम तक आयेंगे
तो सोचा तुम्हारे घर के चक्कर लगा लेती हु
(तभी मुन्ना रश्मि के पास आकर बैठता है, कुछ बोलता है , रश्मि उसे चुप कराती है )
रश्मि – रज्जो को बिठाते हुए , अरे चक्कर से याद आया पडोसी के चक्कर के बारे बताया नहीं
(मुन्ना पास में रखा फोन उठता है और वंहा से खिसक जाता है )
दोनों फिर गप्पे मारने लगते है
सीन -4
दीपक और रश्मि टेबल पर बैठे होते है , मुन्ना जो अब थोडा सा बड़ा हुआ है वो दूसरे बेड पर बैठा हुआ है – बगल में कापी किताब फैला हुआ है और वो मोबाईल में कुछ देख रहा है )
दीपक- रश्मि से शिकायत के लहजे में – देख रही हो अपने लाडले को सारा दिन मोबाईल में लगा रहता है , कापी किताब तो जैसे काटता है ,
रश्मि – इसमें मेरी क्या गलती है आपके ही दुलार ने उसे सर पर बिठा रखा है
दीपक – आवाज देता है – मुन्ना मुन्ना
(मुन्ना उधर देखता ही नहीं है वो तो मोबाईल में लगा रहता है , रश्मि उसके हाथ से मोबाईल छीनकर टेबल पर रखती है , मुन्ना रोता हुआ आता है और टेबल से मोबाईल उठा लेता है , जिसे देखकर दीपक को गुस्सा आ जाता वो मुन्ना को थप्पड़ लगा देता है , और मुन्ना मोबाईल को जमीन पर पटक देता है )…
सलाह – आज के सामाजिक परिवेश को देखकर सभी पेरेंट्स से यही कहना चाहता हु की अपने बच्चो को मोबाईल की आदत से दूर रखे , उन्हें पूरा समय दे , उनके साथ समय बिताये न की मोबाईल देकर पीछा छुडाये .
मोबाइल ने छीना बचपन – बच्चों की मोबाइल की लत पर एक भावनात्मक सामाजिक कहानी Read More »
दृश्य -1
नौकरी और पैसों की दौड़ में कहीं अपने सबसे अनमोल रिश्ते पीछे न छूट जाएँ।आरव कुछ सोच रहा होता है , मैं कितना ही अभागा हूँ या खुदगर्ज हूँ जो सही गलत का फैसला न ले सका , चंद रुपयों की खातिर मैंने रिश्ते को अहमियत नहीं दी और फिर सोच में डूब जाता है
(दादी कुछ अनाज बीन रही है , बहु (शीला ) घर के काम कर रही है एक 7 साल का बच्चा आस पास में खेल रहा है और फिर दादी के पास जाकर जो अनाज बीन रही है उसे मिला देता
है)
दादी – (गुस्से में ) नालायक ये किया सारा किये पर पानी फेर दिया , अब इसे क्या तेरी माँ बीनेगी ,
(बच्चा रोने लगता है ) फिर दादी ही उसे चुप कराती है दुलार करने लगती है .,
शीला – ये दिन पर दिन शैतान होता जा रहा है, स्कूल में नाम लिखा दिया है लेकिन खेलने के आगे कभी पढाई नहीं करता .
आरव (बच्चा) – मम्मी अभी खेलने दो बाद में पढ़ लूँगा न ( और दादी का चश्मा उतारकर पहन लेता है और इधर उधर भागने लगता है लेकिन वो खम्भे से टकरा जाता है और उसके सर में चोट लग जाती है )
शीला आवाज सुनकर दौड़कर आती है , दादी भी आती है दोनों उसे उठाते है उसके सर से खून निकल रहा होता है, दादी अपना आँचल फाड़कर उसके सिर पर बांधती है ,
दादी– बहु तू अजय को फोन कर के बुला ले लगता है ज्यादा चोट लग गया है, मैं तब तक डाक्टर को बुला कर लाती हूँ
(शीला अजय को फोन लगाने लगती है इतने में दादी डाक्टर को बुलाने भागती है )
अजय आता है , आरव बिस्तर पर लेटा है उसके सिर में पट्टी बंधी है, दादी उसके सिरहाने बैठी हुई है ,
अजय – क्या हुआ शीला इसे चोट कैसे लगी .
शीला – कुछ नहीं वो अपनी दादी का चश्मा पहनकर भाग रहा था तो खम्भे से टकरा गया .
अजय – क्या माँ तुम भी न , पता है ये पावर का चश्मा है तो उसे क्यों पहनने दिया , आखिर फोड़ लिया न सर
दादी – बेटा मैंने कब दिया उसने उतार लिया , तो
अजय – (बात को बीच में काटते हुए ) रोक तो सकती थी न, और शीला तुम्हे तो ख्याल रखना चाहिए था एक बच्चे को सम्भाला नहीं जाता .
(शीला पानी का ग्लास देते हुए, डाक्टर ने बोला है मामूली चोट है दो दिन में ठीक हो जायेगा )
दृश्य -3
रात का समय है अजय और शीला अपने कमरे में सो रहे है , आरव बिस्तर पर लेता है और दादी अभी भी उसके सिरहाने बैठी हुई है
आरव ( करवट लेते हुए ) – मम्मी – मम्मी प्यास लगी है,
दादी – (तुरंत पानी का ग्लास देते हुए ) ले बेटा पानी पे ले .
आरव – मम्मी कहा है ..
दादी – मम्मी पापा सो गए है , दिन भर काम करके थक जाते है न, अब तू भी सो जा , दर्द तो नहीं हो रहा है न
आरव – थोडा थोडा हो रहा है
दादी – सर पर हाथ फेरते हुए , जल्दी ठीक हो जायेगा
दृश्य -4
( आरव बड़ा हो चुका है और शहर में कमाने लगा है )
अजय – (फोन पर ) – हेल्लो बेटा कैसा है
आरव – मैं ठीक हु पापा , आप कैसे है , मम्मी कैसी है
अजय – बेटा हम सब ठीक है , बस तुम्हारी दादी की तबियत ज्यादा ख़राब है , कह रही है आरव को बुला दो
आरव – पापा मै तो आ जाता लेकिन पता है, अभी साल का आखिरी दिन चल रहा है और मेरी सैलरी बढ़ने वाली है , अगर अभी छुट्टी लिया तो मेरा नुक्सान हो जायेगा .
(दादी जो बीमार है और बिस्तर पर लेटी है उसकी आवाज सुनती है , )
दादी – क्या बोला आरव ने
अजय – कुछ नहीं माँ वो आजकल काम ज्यादा है न तो बस
दादी – कोई बात नहीं बेटा शहर में पैसे की बहुत जरुरत पड़ती है ,
दृश्य -5
दादी का शव रखा हुआ है , सभी रो रहे है
अजय – (फोन पर )- हेल्लो आरव बेटा
आरव – नमस्ते पापा ,मैं बहुत खुश हूँ , बॉस ने मेरी सेलरी बढ़ा दी है ,ऑफिस में मेरे काम की तारीफ हो रही है
अजय – हा बेटा , वो तो ठीक है लेकिन मैंने ये बताने के लिए फोन किया है अब तेरी दादी इस दुनिया में नहीं रही, आखिरी समय में वो तुझे याद करती रही
आरव दुखी हो जाता है , उसके आँखों में आंसू भर आता है उसके मुंह से शब्द नहीं निकलते है.
अजय – बेटा अगर आ सकता है तो अंतिम दर्शन के लिए आ जा , हम शाम तक ही शव को लेकर जायेंगे .
आरव- जी पापा मैं आ रहा हूँ मेरे आने तक इंतजार करना ( फोन रखता है और बिलख बिलख कर रोने लगता है )
आजकल हम पैसे और नौकरी में इतने ब्यस्त हो जाते है की हमें रिश्ते की अहमियत कम लगने लगती है , ऐसा हर किसी के साथ होता है , लेकिन सही मायने में हमें अपने रिश्ते को अपने उस वृद्ध हो चुके दादा दादी को यूँ ही नजरअंदाज नहीं करना चाहिए , क्योकि ये वही पेड़ है जिनकी छाया में तुम फलते फूलते रहे .
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Do Work for Only Your Work
आज के समय में अधिकांश लोग अपने काम से अधिक उस काम की सराहना पाने पर ध्यान देते हैं। जब किसी कार्य के बदले प्रशंसा, पुरस्कार या पहचान नहीं मिलती, तो वे निराश हो जाते हैं। लेकिन जीवन का सबसे बड़ा सत्य यह है कि हमें काम केवल प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और अपने उद्देश्य के लिए करना चाहिए। यही इस प्रेरणादायक विचार का सार है—”Don’t Do Work for Appreciation, Do Work for Only Your Work.”
जब कोई व्यक्ति केवल प्रशंसा पाने के लिए काम करता है, तो उसका ध्यान परिणाम और दूसरों की राय पर केंद्रित हो जाता है। यदि लोग उसकी तारीफ करें तो वह खुश होता है, और यदि कोई उसकी मेहनत को न पहचाने तो वह दुखी हो जाता है। इस प्रकार उसका आत्मविश्वास दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर हो जाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने काम से प्रेम करता है और उसे पूरी ईमानदारी से करता है, वह बाहरी प्रशंसा का मोहताज नहीं होता।
इतिहास में अनेक महान व्यक्तियों ने बिना किसी तत्काल प्रशंसा की अपेक्षा के अपना कार्य किया। उन्होंने अपने लक्ष्य, अपने सिद्धांतों और अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दी। समय के साथ उनकी मेहनत और समर्पण ने उन्हें सम्मान और सफलता दिलाई। इसका अर्थ यह है कि सच्ची पहचान अपने आप मिलती है, लेकिन उसका पीछा करने से अक्सर निराशा ही हाथ लगती है।
काम को पूजा माना गया है। जब हम अपने कार्य को पूरी लगन, निष्ठा और ईमानदारी से करते हैं, तो वह स्वयं हमारी पहचान बन जाता है। चाहे कोई देखे या न देखे, चाहे कोई सराहे या न सराहे, हमारा प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता। हर मेहनत हमें कुछ नया सिखाती है, हमारे व्यक्तित्व को मजबूत बनाती है और हमें सफलता के और करीब ले जाती है।
जीवन में कई बार ऐसा होगा जब हमारी मेहनत को तुरंत पहचान नहीं मिलेगी। लोग हमारी उपलब्धियों को नजरअंदाज कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारा काम महत्वहीन है। वास्तव में, सबसे मूल्यवान कार्य वही होते हैं जो बिना शोर-शराबे के, पूरी निष्ठा से किए जाते हैं। इसलिए हमें अपने कार्य की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए, न कि लोगों की तालियों पर।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि सच्ची सफलता तब मिलती है जब हम अपने काम को अपना कर्तव्य समझकर करते हैं, न कि प्रशंसा पाने का साधन। प्रशंसा अस्थायी होती है, लेकिन उत्कृष्ट कार्य स्थायी पहचान बनाता है। इसलिए हमेशा याद रखें—काम इसलिए मत करो कि लोग आपकी तारीफ करें; काम इसलिए करो क्योंकि वह आपका कर्तव्य है और आप उसे बेहतरीन तरीके से करना चाहते हैं। जब आपका काम बोलने लगेगा, तब दुनिया अपने आप आपकी सराहना करेगी।
आज का विचार – “Don’t Do Work for Appreciation, Do Work for Only Your Work” Read More »
हे मंहगाई देवता तुमको है प्रणाम ,
इस दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई नहीं महान ।
रोज बढ़ाते दाम तुम , जरा न करते देरी,
तुम्हे पूजते वही रात दिन , करते जो हेरा फेरी ।।
रोटी कपड़ा घर का सपना बस केवल अरमान,
इस दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई नहीं महान ।।
सब्जी मंडी रो रही , सिसक रहा है गल्ला,
तरस रहा है दूध को देखो हर एक छोटा लल्ला ।
सेव संतरे तड़प उठे , न रहा कोई पहचान,
इस दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई नहीं महान ।।
महँगी हुई किताबे कापी, महँगी हुई दवाई,
खर्चे केवल बढ़ रहे है , बढती नहीं कमाई ।
डीजल पेट्रोल के दाम को सुनकर निकली जाये जान,
इस दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई नहीं महान ।।
बेटा देखो खड़ा लाइन में लेने टिकट धुरंधर,
माँ बापू है खड़े हाथ में खाली लिए सिलिंडर ।
सिखा दिया है थोड़े दिन में कैसे जिए इंसान,
इस दुनिया में तुमसे बढ़कर कोई नहीं महान ।।
महंगाई देवता – MEHANGAI DEVATA Read More »

तेरी महिमा मैं क्या जानूँ, वो जाने वेद पुरान
तीनो लोक में नहीं मिलेगा तुझसे बड़ा महान
पल में प्रलय कर सकता है तू है प्रलयंकारी
दानी भी न तुझसा कोई जाने दुनिया सारी
झोली ही कम पड़ जाती जिसको तू देता दान
तीनो लोक में नहीं मिलेगा तुझसे बड़ा महान
जब जब संकट आया जग पर तूने ही संहार किया
जल थल नभ का एक ही पल में तूने है उद्धार किया
सारे प्राणी पूजे तुझको देव हो या शैतान
तीनो लोक में नहीं मिलेगा तुझसे बड़ा महान
मैं अज्ञानी नर अभिमानी कभी न तुझको याद करू
विपति पड़े तो उस पल आकर तुझसे ही फरियाद करू
कुछ न सोचे कैसे भी हो कर देता कल्याण
तीनो लोक में नहीं मिलेगा तुझसे बड़ा महान l
कवि – बीरेंद्र गौतम ” अकेलानंद” – बस्ती
तेरी महिमा मैं क्या जानूं – शिव महिमा Read More »
जो मैं इतना जानता पी एम् बनना बे-आस
राजनीति को छोड़कर ले लेता सन्यास

एक बार बनाकर पी एम् हमको देखो मोदी जी
राहुल ये रो रो कहे ।
एक बार चलाकर शासन हम देखेंगे मोदी जी
राहुल ये रो रो कहे।।
क्या काला धन होता है, क्या घोटाला होता है,
नदियों का पानी क्यों गन्दा नाला होता है,
एक बार हमें भी बजट पास करने दो मोदी जी
राहुल ये रो रो कहे।।
एच 1 बीजा से क्यों हमें ट्रम्प डराता है,
टैरिफ हम पर क्यों वो 100 परसेंट लगाता है,
एक बार ट्रंप से मीटिंग तो करवा दो मोदी जी
राहुल ये रो रो कहे।।
सभी चुनाव से पहले क्यों धमाका होता है,
ई वी एम् मशीन से वोटो का क्यों डाका होता है,
बैलेट पेपर से वोट जरा डलवा दो मोदी जी
राहुल ये रो रो कहे।।
(मोदी जी – भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री , राहुल – कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष , ट्रंप- अमेरिका के राष्ट्रपति , एच 1 बीजा – ट्रंप द्वारा भारतीयों पर लगाया आदेश , ई वी एम् मशीन – जिससे वोट डाला जाता है )
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दगाबाज रे , हाय दगाबाज रे
सारे नेता बड़े दगाबाज रे
नेता नेता हाय नेता ….. नेता नेता
छोटे नेता.. बड़े नेता .. बैठे नेता .. खड़े नेता
सारे नेता बड़े दगाबाज रे
कल लिए वोट भूल गए आज रे
दगाबाज रे सारे नेता बड़े दगाबाज रे
आते चुनाव में गिर जाते पाँव में
देखे न धरम जतिया ……
कहते जिताओगे तो साथ खड़े पाओगे
दिन हो या हो रतिया …….
बस एक बार हम पर एहसान कई दे
हमरा मुहर पर इस बार ध्यान दई दे
फिर तो न करिहे इ तोहसे बात रे
दगाबाज रे .. सारे नेता बड़े दगाबाज रे
वादा किये है जो पूरा न करते है
जाने है सब बतिया ….
करते घोटाले है दिन इनके काले है
मारी गई है मतिया ….
इक से इक बढकर इनके है पाप रे
फिर भी छबि इनकी रहती है साफ़ रे
हाय दगाबाज रे .. दगाबाज रे ..
सारे नेता बड़े दगाबाज रे
सारे नेता बड़े दगाबाज रे Read More »
कविता
पत्नी है जान मेरी
पत्नी है शान मेरी
हर पल पत्नी हीं
रखती है ध्यान मेरी
पत्नी हीं ध्यान है
पत्नी हीं ज्ञान है
सभी देविओं में सिर्फ
पत्नी महान है
पत्नी सुबह होती
पत्नी हीं शाम है
पत्नी के दया से हीं
बनते सब काम है
पत्नी हीं भूख होती
पत्नी हीं प्यास है
सुख दुख गम की
पत्नी हीं रास है
पत्नी बनाती घर
पत्नी सजाती घर
पत्नी से हीं मिलती
चैन की सांस है
पत्नी के साथ रहो
जो वो चाहे वही कहो
वरना पूरे घर की
करतीं विनाश है
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कवि बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद”
बस्ती-उत्तर प्रदेश
कौन काटेगा कौन बाँटेगा , सच्चा हिन्दू कौन छाँटेगा
आज धर्म की बात करेंगे, पीछे फिर बर्बाद करेंगे
अभी तलक क्यो सोये थे, जब हम निचले रोये थे
तब तक क्या हम हिन्दू ना थे, तेरे धर्म के बिंदु न थे

तब तुमने फटकार दिया, कुत्ते सा दुत्कार दिया
गले मे हांडी डाली थी , कहते हमको गाली थी
तेरे राह न चलते थे, गन्दगियो मे पलते थे
ना पढ़ने लिखने का हक़ था, पास ना धन् रखने का हक था

तुमने वेद पुराण बनाया, 33 करोड़ भगवान बनाया
मंदिर की भरमार हुई, फिर जाति एक लाचार हुई
चार जगह से जन्म दिखाया, खुद को मुख से उतपन्न बताया
शूद्र – शूद्र कहकर चिल्लाये, सबके मन मे जहर फैलाये

हम खुद से ही शर्माते थे, और मुखड़ा सदा छिपाते थे
तुम तो भगवान के प्यारे थे, हम पिछले जन्म के मारे थे
कुछ ऐसा ही पाठ पढ़ाया, स्वर्ग नरक का डर दिखलाया
फिर एक मसीहा जाग उठा, दिल में सबके तूफ़ान उठा

जिस दिन लागू सविधान हुआ, वो हम सबका भगवान हुआ
तब जाकर हम इंसान बने, फिर पढ़ लिखकर धनवान बने
अब तुमने जो गुमराह किया, है वादा तुम्हे न छोड़ेंगे
जितने वर्षो तक हमें सताया, उतने टुकड़ो में तोड़ेंगे
हम बौद्ध धर्म अनुयायी है, ना बैर किसी से करते है
पर बात अगर अभिमान की हो, फिर मरने से ना डरते है
है देश में डंका बाज रहा, आज जय भीम के नारो से
शिक्षित और संगठित रहो, ना डरना इन गद्दारों से.
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कवि बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद”
जिला बस्ती , उत्तर प्रदेश
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कौन हूँ मैं, मैं कौन हूँ
आन हूँ मैं बान हूँ
खुद की अपनी शान हूँ
जिन्दगी में कौन मेरा
मैं तो खुद की जान हूँ
कौन हूँ मैं , मैं कौन हूँ
सपनो का मैं राही हूँ
मैं निडर सिपाही हूँ
अपनी बलि चढाने को
खुद ही मैं कसाई हूँ
कौन हूँ मैं , मैं कौन हूँ
ना मेरा कोई प्यार है
न किसी से इजहार है
तन्हाई में मैं जीता हूँ
तन्हाई मेरा यार है
कौन हूँ मैं, मैं, कौन हूँ
कोई ख्वाब मेरा तोड़ गया
मझधार में ही छोड़ गया
एहसान किया उसने मुझ पर
मुझको मुझसे जोड़ गया
कौन हूँ मैं, मैं कौन हूँ
अब तो मैं रुकुंगा नहीं
अब कभी झुकूँगा नहीं
वो खुद को चाहे मार दे
पर साथ दे सकूँगा नहीं
कौन हूँ मैं, मैं कौन हूँ
अब किसी की सुनना नहीं
साथी कोई चुनना नहीं
शांत हो चूका हूँ मैं
ख्वाब कोई बुनना नहीं
अब मौन हूँ मैं, हां मैं मौन हूँ
कवि बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद “

दादा जी दादा जी मुझको फिर से गले लगाओ न,
घिरा पड़ा हूँ अंधकार से आकर राह दिखाओ न ।
बचपन में चलते चलते जब घुटने पर गिर जाता था ,
मिट्टी कीचड़ में सन करके मैं गंदा हो जाता था ।।
रोते रोते सूनी आँखे आंसू से भर जाती थी ,
माता भी गुस्से में जब पास न मेरे आती थी ।
झुकी कमर से भी तुम तब ऐसी दौड़ लगाते थे,
राजा बेटा मेरा कहकर फ़ौरन गोद उठाते थे ।।
आज गिरा हालात में फसकर फिर से मुझे उठाओ न ।
दादा जी दादा जी मुझको फिर से गले लगाओ न ।।
राजा रानी, घोड़े हाथी के किस्से रोज सुनाते थे,
मुझे बिठा कर पीठ पर अपने खुद घोडा बन जाते थे ।
कभी सहारा बनू आपका , मुझको चलना सिखलाया,
सही गलत में फर्क भी करना तुमने मुझको बतलाया ।।
आज जमाना बदल चुका है समझ नहीं कोई आता ,
रहे सामने साथी बनकर पीछे से गला दबा जाता ।
कौन है अपना कौन पराया फिर मुझको समझाओ न,
फिर से गिरा मुसीबत में अब इससे मुझे बचाओ न ।।
दादा जी दादा जी मुझको फिर से गले लगाओ न ।
घिरा पड़ा हूँ अंधकार से आकर राह दिखाओ न ।।
कवि बीरेंद्र गौतम ” अकेलानन्द”
दादा जी दादा जी मुझको फिर से गले लगाओ न Read More »
किसी बात पर हंसो , कभी बिन बात पर हंसो
हालत नहीं अच्छे तो, अपने हालात पर हंसो
हंसो हर दिन पर और हर रात पर हंसो
कभी जुदाई पर हंसो तो, कभी मुलाकात पर हंसो
अपने हार पर हंसो, फिर उसी जज्बात पर हंसो
किसी ने दी नहीं कभी , हर उस सौगात पर हंसो
ज़माना हंस रहा तुम पर, उस सवालात पर हंसो
हंसो हरदम की जब तक, तुम्हारे अंदर सांस बाकी है
और जब अंत हो नजदीक , तो उस कायनात पर हंसो
सदा उदास रहने से, सब कुछ बिखर जाता है
और हंसते रहने से जीवन संवर जाता है
अकेले में भी हंसो और सबके साथ भी हंसो
किसी बात पर हंसो तो कभी बिन बात पर हंसो
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बीरेंद्र गौतम ” अकेलानंद “
हंसो हमेशा जिन्दगी में Read More »

तेरा मुझसे दूर जाने का कोई गम नहीं,
सुकून है इसकी वजह तो हम नहीं ।
जमाने से जाकर मेरी ही कमियाँ गिनाएगी,
फिर भी यकीं है की तेरी दलील में कोई दम नहीं ।।
इस हुश्न की तारीफ़ में कुछ न बोलूँगा ,
हर गम को सहते हुए छुपकर रो लूँगा ।
मालूम है उसका प्यार सिर्फ मेरा ही नहीं है ,
पर ये राज जमाने के सामने नहीं खोलूँगा ।।
कहने को तो बहुत कुछ है पर आप सुनते कहाँ हो ,
हमारे यादो के भी सपने आप बुनते कहाँ हो ।
हमने तो पहली नजर में आपको अपना बना लिया,
किसी कशमकस में आप हमें चुनते कहाँ हो ।।
उसकी बेरुखी को कब तक सह पाऊंगा ,
अब जाने किस हद तक चुप रह पाऊंगा ।
पता है वो शामिल है किसी गैर की महफ़िल में ,
प्यार खोने के डर से मैं कुछ न कह पाऊंगा ।।
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तेरा मुझसे दूर जाने का गम नहीं Read More »