कहानियाँ

बदलते रिश्ते

पापा, वो मेरी भी बहन है | बदलते रिश्तों की एक भावुक कहानी

पापा, वो मेरी भी बहन है | बदलते रिश्तों की एक भावुक कहानी

बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद ” की कलम से

बदलते रिश्तो की कहानी – ये कहानी एक भाई की कहानी है जैसा की आज का माहौल है  की शादी के बाद बेटी परायी हो या न हो लेकिन बेटे को जरुर पराया समझ लिया जाता है-

भाग – 1 : बदलते रिश्तों की आहट

बदलते रिश्ते
बदलते रिश्तो की कहानी

शाम धीरे-धीरे अपने आँचल में पूरे मोहल्ले को समेट रही थी। दिनभर की चहल-पहल अब सन्नाटे में बदलने लगी थी। दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और गली में खेलते बच्चों की आवाज़ें भी अब कम हो चुकी थीं। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी, लेकिन उस घर के बरामदे में माहौल बिल्कुल उल्टा था। वहाँ गर्मी मौसम की नहीं, रिश्तों की थी।

घर के बाहर रखी पुरानी कुर्सी पर शेखर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर दिनभर की मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसकी नज़रें सामने सड़क पर थीं, लेकिन मन शायद कहीं और भटक रहा था। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसके अपने ही घर के अंदर कुछ ऐसा होने वाला है, जो आने वाले समय में पूरे परिवार के रिश्तों की दिशा बदल देगा।

घर के अंदर अपने कमरे में समर किसी जरूरी काम में व्यस्त था। उसके सामने खुला लैपटॉप था और पास ही कुछ कागज़ रखे थे। वह पूरी कोशिश कर रहा था कि अपना काम समय पर पूरा कर ले। बाहर से आती आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं, लेकिन उसने सोचा कि घर की छोटी-मोटी बात होगी और थोड़ी देर में सब शांत हो जाएगा।

बरामदे में स्वाति और साक्षी आमने-सामने खड़ी थीं।

दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहस शुरू हो चुकी थी।

शुरुआत में आवाज़ें धीमी थीं, लेकिन देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि घर की दीवारें भी जैसे उन शब्दों की गवाह बन गईं।

साक्षी ने गुस्से में कहा,

“आप अपने काम से काम रखिये, मेरी माँ बनने की कोशिश मत करो।”

उसकी आवाज़ में सम्मान से ज़्यादा तकरार थी।

स्वाति ने अपने गुस्से को दबाते हुए शांत स्वर में कहा,

“देखो साक्षी, मैं तो बस तुम्हे समझा रही थी, की पढ़ाई पर ध्यान दो, इन फालतू के चक्करों में मत पड़ो।”

वह डाँटना नहीं चाहती थी। वह केवल इतना चाहती थी कि साक्षी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। उसे लगता था कि अगर आज नहीं समझाया गया, तो कल देर हो जाएगी।

लेकिन साक्षी उस समय समझने के मूड में बिल्कुल नहीं थी।

उसने तुरंत जवाब दिया,

“मुझे पता है की मुझे क्या करना है क्या नहीं, इसलिए आप चुप ही रहो।”

उसकी बात सुनकर स्वाति कुछ पल के लिए शांत हो गई।

कभी-कभी सामने वाले का गुस्सा देखकर इंसान खुद को रोक लेता है, लेकिन जब बात अपने परिवार की इज़्ज़त और भविष्य की हो, तब चुप रहना भी आसान नहीं होता।

स्वाति ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की।

“हाँ मुझे पता है की तुम्हे सही गलत की समझ है, अभी पेपर आने वाले है तो उस पर ध्यान देने की बजाय तुम…. खैर छोड़ो, कम से कम पापा के बारे में सोचो, अपने भाई के बारे में सोचो, इनकी बदनामी तो मत कराओ, कितने मेहनत से पैसे कमाकर तुम्हारी पढ़ाई में लगा रहे है।”

कमरे के अंदर बैठा समर अब सब कुछ साफ-साफ सुन रहा था।

उसने अपने हाथ रोक दिए।  कुछ पल तक वह कुर्सी पर बैठा रहा।

उसने सोचा…

“दोनों समझदार हैं। थोड़ी देर में मामला शांत हो जाएगा।”

लेकिन अगले ही पल उसे स्वाति की आवाज़ फिर सुनाई दी। इस बार आवाज़ पहले से ज़्यादा तेज़ थी।

समर ने गहरी साँस ली, अपना काम अधूरा छोड़ दिया और कमरे से बाहर निकल आया।

उसे देखते ही स्वाति ने राहत की साँस ली।

“अब आप ही समझाओ इसे।”

लेकिन साक्षी का गुस्सा अब तक ठंडा नहीं हुआ था। उसने बिना रुके कहा,

“देखो मुझे किसी से कुछ नहीं समझना और जो आप कह रही हो न की सारी कमाई मेरे पढ़ाई में लगा देते है तो ऐसा कुछ नहीं है, मैं अपने पापा के पैसे से पढ़ रही हूँ, और पापा ने ही तो इन्हें पढ़ाया है न, अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”

ये शब्द सुनते ही समर जैसे भीतर तक काँप गया।

उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही साक्षी है, जिसे उसने बचपन से गोद में खिलाया, जिसके लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ छोड़ीं, जिसकी हर ज़िद पूरी करने की कोशिश की…

आज वही बहन उसके लिए “एहसान” शब्द का इस्तेमाल कर रही थी।

कुछ रिश्ते टूटते नहीं…

लेकिन एक वाक्य उन्हें पहले जैसा भी नहीं रहने देता।

समर कुछ कहना चाहता था।  उसके होंठ खुले ही थे कि तभी स्वाति बोल पड़ी।

“देखो तुम्हे अपने भैया से इस तरह से बाते नहीं करनी चाहिए, तुम्हारी जुबान कुछ ज्यादा ही चलने लगी है, मेरी बहन होती तो अभी पीट कर रख देती।”

यह सुनते ही साक्षी का गुस्सा पूरी तरह फूट पड़ा।

उसने चुनौती भरे स्वर में कहा,  “हाँ तो मारो न, मारो मुझे।”

इतना कहते हुए उसने स्वाति को ज़ोर से धक्का दे दिया। स्वाति अपना संतुलन नहीं संभाल सकी।

वह पीछे जाकर दीवार से टकरा गई। एक पल के लिए पूरा घर जैसे थम गया।

समर ने जब अपनी पत्नी को दीवार से टकराते देखा, तो उसके भीतर का धैर्य टूट गया। उसने बिना कुछ सोचे आगे बढ़कर साक्षी के गाल पर एक थप्पड़ मार दिया।

थप्पड़ की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।

और उसी आवाज़ के साथ जैसे इस घर की शांति भी टूट गई। बाहर बैठे शेखर ने जैसे ही थप्पड़ की आवाज़ सुनी, वह तुरंत उठकर अंदर आया।

उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। बरामदे में पहुँचते ही उसने ऊँची आवाज़ में पूछा,

“क्या तमाशा बना रखा है तुम लोगो ने?”

समर जल्दी से बोला,

“पापा मैं बताता हूँ वो साक्षी ने स्वाति को…”

लेकिन शेखर ने उसकी बात पूरी होने ही नहीं दी।

उसने गुस्से में कहा,

“क्या सुनूँ मैं तुम्हारी, जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”

ये शब्द समर के सीने में किसी तीर की तरह जाकर लगे।

उसे उम्मीद थी कि पापा पहले पूरी बात सुनेंगे।

लेकिन फैसला तो उसकी बात पूरी होने से पहले ही सुनाया जा चुका था।

समर ने खुद को संभालते हुए कहा,

“पापा वो मेरी भी बहन है और उसने स्वाति के साथ बदतमीज़ी की, वो तो उसे बस समझा रही थी।”

शेखर का चेहरा और सख्त हो गया। उसने उँगली दिखाते हुए कहा,

“चुप एकदम चुप, आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा, अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट, आयी बात समझ में।”

यह पहली बार था…

जब समर को महसूस हुआ कि वह अपने ही घर में किसी पराए की तरह खड़ा है। जिस पिता ने कभी उसी पर भरोसा करके अपनी बेटी की जिम्मेदारी उसे सौंपी थी…

आज वही पिता उसे अपनी बहन से दूर रहने का हुक्म दे रहे थे।

समर ने एक बार साक्षी की तरफ देखा। फिर अपने पिता की ओर। उसने कुछ कहना चाहा…

लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।

कुछ रिश्ते आवाज़ से नहीं…

खामोशी से टूटते हैं।

वह बिना कुछ बोले अपने कमरे की ओर चल पड़ा।

उसके कदम भारी थे।

कमरे का दरवाज़ा बंद करते ही वह बिस्तर पर बैठ गया। कमरे में सन्नाटा था…

लेकिन उसके भीतर यादों का शोर उठने लगा था। उसे याद आने लगा…

एक समय ऐसा भी था, जब यही साक्षी उसकी दुनिया की सबसे प्यारी ज़िद हुआ करती थी…

जिसकी हर मुस्कान के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था…

और उसके पापा…

वो भी तब हर बात पर यही कहते थे—

“समर… अब तू ही इसे समझा सकता है।”

यादों का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा…

और समर का मन कई साल पीछे लौट गया…

भाग – 2 : यादों का आईना

कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही समर बिस्तर के किनारे बैठ गया। बाहर बरामदे में अभी भी धीमी-धीमी आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उसके कान अब कुछ सुन नहीं रहे थे। शेखर के शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह गूँज रहे थे।

“जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”

समर ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।

आँखें बंद होते ही वर्तमान की कड़वी सच्चाई धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगी और बीते हुए दिनों की मीठी यादें उसके सामने जीवित होने लगीं।

उसे याद आया… एक समय ऐसा भी था, जब इस घर में झगड़ों की जगह हँसी गूँजा करती थी। हर शाम इसी आँगन में सब लोग साथ बैठते थे। शेखर की डाँट में भी अपनापन होता था और साक्षी की जिद पूरे घर को मुस्कुराने पर मजबूर कर देती थी।

उसी समय की एक तस्वीर उसकी आँखों के सामने उभर आई।

रसोई से गरम-गरम खाने की खुशबू आ रही थी। खाने की मेज़ पर समर और साक्षी साथ बैठे थे। दोनों खाते कम और एक-दूसरे की खिंचाई ज़्यादा कर रहे थे।

साक्षी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा,

“भैया इस बार मेरे बर्थडे पर एक अच्छी सी ड्रेस दिलाएगा क्या?”

समर ने उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराकर पूछा,

“किस तरह की ड्रेस चाहिए बता।”

साक्षी की आँखों में चमक आ गई।

“कुछ अलग तरह की जो अभी तक नहीं पहनी, जैसे फिल्मो में पहनते है।”

समर ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया और बोला,

“ठीक है इस बार चुड़ैल वाली ड्रेस लाता हूँ वो तूने अभी तक नहीं पहनी है।”

बस फिर क्या था…

साक्षी ने तुरंत मुँह फुला लिया।

“भैया मजाक मत करो, मैं क्या चुड़ैल लगती हूँ, ठीक है भाभी को आने दो फिर देखूंगी उन्हें कौन से चुड़ैल वाली ड्रेस लाकर दोगे।”

इतना सुनते ही समर ज़ोर से हँस पड़ा।

साक्षी ने गुस्से का नाटक करते हुए रोटी का छोटा-सा टुकड़ा उसकी तरफ फेंक दिया।

दोनों की नोकझोंक देखकर शेखर भी मुस्कुरा दिए।

उस दिन घर की दीवारों पर केवल हँसी गूँज रही थी।

समर ने कभी महसूस ही नहीं किया था कि वही छोटी-सी लड़की, जो हर बात पर उससे रूठ जाती थी, एक दिन उसी से इतनी दूर हो जाएगी।

यादों का सिलसिला यहीं नहीं रुका।

एक और घटना उसके सामने चलचित्र की तरह घूमने लगी।

उस दिन दोपहर का समय था। समर घर पर बैठा कुछ काम कर रहा था। तभी उसका फोन बजा। उसने फोन उठाया और सामने वाले की पूरी बात सुनने के बाद केवल इतना कहा,

“ठीक है आने दो फिर बताता हूँ।”

फोन रखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।  वह चुपचाप दरवाज़े की तरफ देखने लगा। कुछ देर बाद साक्षी घर के अंदर आई। उसे देखते ही समर ने पूछा,

“कहाँ थी अब तक?”

साक्षी ने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा,

“कही नहीं भैया, वो सहेली के साथ थोडा रुक गयी थी इसलिए लेट हो गयी।”

समर उसकी आँखों को पढ़ रहा था।

उसे साफ महसूस हो रहा था कि साक्षी कुछ छिपा रही है।

उसने पास रखी एक छड़ी उठाई और गंभीर आवाज़ में कहा,

“सच बता कहाँ थी और क्या कर रही थी।”

साक्षी का चेहरा उतर गया।  तभी बाहर से शेखर अंदर आए। उन्होंने दोनों को देखा और पूछा,

“क्या हुआ समर, क्या किया इसने?”

समर ने बिना कुछ छिपाए सारी बात बता दी।

“पापा इसी से पूंछो कहाँ थी अब तक, स्कूल से छुट्टी करके लड़को के साथ घूमने गयी थी, और किसी से झगड़ा करके आयी है।”

शेखर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

उन्होंने तुरंत कहा,

“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी, जितना छूट दिया है उतना ही बिगड़ जा रही है, और पूरी कर सारी फरमाइश।”

साक्षी की आँखों से आँसू निकल पड़े।

वह रोते हुए बोली,

“सॉरी पापा वो मेरी सहेली ने बोला की चल आज तुझे अपने घर घुमा के लाती हूँ, उसके दोस्त थे तो वो रास्ते में लड़ाई करने लगे, मैंने कुछ नहीं किया।”

शेखर ने उसकी बात सुनी और बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए। अब घर में केवल समर और साक्षी रह गए थे।

साक्षी सिर झुकाए खड़ी थी।

उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

वह धीरे से समर के पास आई और बोली,

“सॉरी भैया आगे से किसी के साथ नहीं जाउंगी।”

समर का गुस्सा उसी पल पिघल गया।

उसने छड़ी एक तरफ रख दी।

फिर साक्षी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला,

“ठीक है आज छोड़ रहा हूँ लेकिन आगे से अगर कुछ सुन लिया न तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”

साक्षी ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।

कुछ ही पल बाद उसने धीरे से समर का हाथ पकड़ लिया।

जैसे वह कह रही हो…

“मुझसे गलती हो गई भैया… लेकिन मुझसे नाराज़ मत होना।”

उस दिन समर ने उसे डाँटा ज़रूर था, लेकिन उस डाँट में एक बड़े भाई की चिंता थी।

और सबसे बड़ी बात…

उस दिन शेखर ने एक बार भी यह नहीं कहा था कि “मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”

उल्टा… उन्होंने खुद समर से कहा था,

“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी।”

यही बात आज समर के दिल को सबसे ज़्यादा चुभ रही थी।  आखिर ऐसा क्या बदल गया था?

वह तो आज भी वही भाई था…  साक्षी भी वही बहन थी…

शेखर भी वही पिता थे…

फिर रिश्तों के मायने अचानक कैसे बदल गए?  समर की आँखों से एक आँसू निकलकर उसके हाथ पर गिरा।

उसने धीरे से उसे पोंछ लिया।  उसे समझ नहीं आ रहा था कि दर्द इस बात का ज़्यादा था कि साक्षी बदल गई…

या इस बात का कि उसके अपने पिता बदल गए।

कमरे के बाहर रात गहराने लगी थी। लेकिन समर के भीतर यादों की सुबह अभी भी जाग रही थी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि यह तो बस शुरुआत थी…

रिश्तों की असली परीक्षा अभी बाकी थी।

भाग – 3 : बदलते रिश्तों का दर्द

समर की आँखें अब भी खुली थीं, लेकिन उसकी नज़रें कमरे की दीवार पर टिकी हुई थीं। बाहर रात पूरी तरह उतर चुकी थी। बरामदे में फैला सन्नाटा बता रहा था कि झगड़ा तो खत्म हो गया है, लेकिन उस झगड़े की गूँज अभी भी घर की दीवारों में कैद थी।

उसी समय दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।

स्वाति धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।

उसके चेहरे पर भी उदासी साफ दिखाई दे रही थी। दीवार से टकराने की वजह से उसके हाथ पर हल्की-सी चोट भी आ गई थी, लेकिन शायद उस चोट से ज़्यादा दर्द उसे समर की खामोशी का हो रहा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले बैठे रहे। खामोशी कभी-कभी शब्दों से कहीं ज़्यादा बोलती है।

आख़िरकार स्वाति ने धीरे से कहा,

“खाना लगा दूँ?”

समर ने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा,

“भूख नहीं है।”

स्वाति उसके सामने आकर बैठ गई।

वह जानती थी कि समर भूख की वजह से नहीं, बल्कि अपने टूटे हुए मन की वजह से मना कर रहा है।

उसने धीमे स्वर में कहा,

“इतना मत सोचिए… जो हुआ उसे भूल जाइए।”

समर हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी हुई थी।

उसने पहली बार स्वाति की तरफ देखा और बोला,

“कैसे भूल जाऊँ?”

“जिस बहन को बचपन से अपनी बेटी की तरह संभाला… आज उसी के लिए मैं दुश्मन बन गया।”

कुछ पल रुककर उसने फिर कहा,

“और पापा…”

बस इतना कहकर वह चुप हो गया।

शायद उसके पास शब्द तो थे, लेकिन हिम्मत नहीं थी।

स्वाति उसकी मनःस्थिति समझ रही थी।

उसने धीरे से कहा,

“अब उन्हें समझाने का कोई फायदा तो है नहीं, करने दो जैसा उनका दिल करे, सुना नहीं पापा ने क्या कहा की मेरी बेटी को कुछ कहने की जरुरत नहीं है।”

समर ने गहरी साँस ली।

“यही बात तो समझ नहीं आ रही…”

“जब साक्षी छोटी थी, तब उसकी हर गलती पर पापा मुझे ही बुलाते थे। कहते थे— ‘समर, इसे समझा… इसे डाँट… इसे सही रास्ता दिखा।’ और आज…”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“आज वही पापा कह रहे हैं कि मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।

कुछ देर बाद समर उठकर खिड़की के पास चला गया।  बाहर आँगन में शेखर अब भी उसी कुर्सी पर बैठे थे। उनके चेहरे पर भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।

समर उन्हें देखता रहा। उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—

“क्या सच में पापा बदल गए हैं… या फिर मैं ही बदल गया हूँ?”

उसे याद आया…

माँ के जाने के बाद इस घर में कितनी जिम्मेदारियाँ अचानक उसके कंधों पर आ गई थीं।

साक्षी तब बहुत छोटी थी।

स्कूल छोड़ने से लेकर उसकी किताबें खरीदने तक…

बीमार होने पर रातभर उसके सिरहाने बैठने से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ज़िद पूरी करने तक…

समर ने कभी यह नहीं सोचा कि वह उसका भाई है या पिता। उसे सिर्फ इतना पता था कि साक्षी खुश रहनी चाहिए। कई बार उसने अपनी जरूरतें टाल दी थीं, लेकिन साक्षी की जरूरत कभी नहीं टाली। जब पहली बार साक्षी ने साइकिल सीखने की ज़िद की थी, तब भी समर ही उसे मैदान ले गया था।

जब परीक्षा में कम नंबर आए थे, तब भी पापा के गुस्से से उसी ने उसे बचाया था। जब रात में बुखार आया था, तब भी पूरी रात उसी ने जागकर बिताई थी।

उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब भाई से बढ़कर उसकी जिम्मेदारी बन गई। लेकिन आज…

आज उसी बहन की जुबान से निकले शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे—

“अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”

समर ने आँखें बंद कर लीं।

कभी-कभी इंसान को परायों की बातें उतनी तकलीफ़ नहीं देतीं…

जितनी अपनों की एक बात दे जाती है। उसी समय बाहर से साक्षी के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

समर ने पलटकर देखा। वह कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा।

उसके मन में गुस्सा नहीं था। अगर कुछ था… तो केवल दुख।

दुख इस बात का कि जिस रिश्ते में कभी शिकायतें भी प्यार से खत्म हो जाती थीं, आज उसी रिश्ते में अहंकार ने जगह बना ली थी।

स्वाति उसके पास आकर खड़ी हो गई। उसने धीरे से समर के कंधे पर हाथ रखा।

समर ने उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

“स्वाति… क्या सच में शादी के बाद बेटा बदल जाता है?”

स्वाति ने तुरंत जवाब नहीं दिया।

उसने बस इतना कहा,

“नहीं… बेटा नहीं बदलता।”

“बस कुछ लोगों की नज़र बदल जाती है।”

यह सुनकर समर कुछ नहीं बोला।

उसने एक बार फिर बाहर बैठे शेखर की तरफ देखा।

उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि इस घर में शुरू हुई यह दूरी आने वाले दिनों में रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा बनने वाली है।

रात और गहरी होती जा रही थी।

लेकिन इस घर के रिश्तों पर छाया अँधेरा अभी बाकी था…

भाग – 4 : एक ही छत, अलग-अलग दिल

रात किसी तरह बीत गई, लेकिन उस घर में किसी की नींद पूरी नहीं हुई।

समर देर रात तक करवटें बदलता रहा। कभी वह छत को देखता, कभी आँखें बंद कर लेता। लेकिन जैसे ही आँखें बंद होतीं, पापा के वही शब्द उसके कानों में गूँजने लगते—

“आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा। अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट।”

उधर स्वाति भी जाग रही थी। वह कई बार समर से कुछ कहना चाहती थी, लेकिन हर बार उसके होंठ खामोश रह जाते। वह जानती थी कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन पर शब्द नहीं, केवल समय मरहम लगा सकता है।

सुबह की पहली किरण के साथ घर में हलचल शुरू हो गई।

रसोई में बर्तनों की आवाज़ आने लगी। चाय की खुशबू पूरे घर में फैल गई, लेकिन उस खुशबू में अपनापन कहीं खो गया था।

समर रोज़ की तरह तैयार होकर बाहर आया। बरामदे में शेखर अख़बार पढ़ रहे थे। समर कुछ पल उनके सामने खड़ा रहा।

उसका मन हुआ कि वह आगे बढ़कर कहे—

“पापा… मेरी पूरी बात तो सुन लेते।”

लेकिन अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।

जिस इंसान ने बिना सुने फैसला सुना दिया हो, उसके सामने सफाई देने का क्या मतलब?

वह चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गया। स्वाति ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाय रख दी।

दोनों की नज़रें मिलीं।

उन नज़रों में हजारों बातें थीं, लेकिन दोनों खामोश रहे। इतने में साक्षी अपने कमरे से बाहर आई।

उसने एक बार भी समर की तरफ नहीं देखा। जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।

वह सीधे शेखर के पास जाकर बैठ गई। शेखर ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा,

“अब ठीक है न बेटा?”

साक्षी ने धीरे से सिर हिला दिया।

समर यह सब देख रहा था।

उसने मन ही मन सोचा—

“कल गलती किसकी थी, यह शायद अब मायने ही नहीं रखता।”

कुछ देर बाद शेखर ने स्वाति की तरफ देखते हुए कहा,

“नाश्ता तैयार है कि नहीं?”

स्वाति बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।

पहले ऐसा नहीं था।

पहले शेखर मुस्कुराकर पूछते थे—

“बहू… आज क्या बनाया है?”

लेकिन आज आवाज़ में अपनापन नहीं, केवल औपचारिकता थी।

समर के लिए यह बदलाव नया नहीं था।

वह पिछले कुछ महीनों से यह सब महसूस कर रहा था।

बस… कल पहली बार यह बदलाव शब्दों में बदल गया था।

नाश्ते के दौरान पूरे घर में अजीब-सी खामोशी थी। पहले इसी मेज़ पर बैठकर हँसी-मज़ाक होता था। साक्षी कभी समर की प्लेट से पराठा उठा लेती, तो कभी उसकी चाय पी जाती।

और समर हर बार उसे डाँटने का नाटक करता। आज वही मेज़ चार लोगों के बीच बैठी चुप्पी को देख रही थी। नाश्ता खत्म करके समर उठने लगा।

तभी शेखर की आवाज़ आई।

“समर…”

समर के कदम रुक गए।

उसे लगा शायद पापा अब कल की बात करेंगे। शायद अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ होगा।

वह मुड़ा। शेखर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,

“ऑफिस जाते समय साक्षी की कॉलेज की फीस जमा कर देना।”

समर ने केवल इतना कहा,

“ठीक है पापा।”

बस…

इतनी ही बात हुई। न कल का जिक्र… न थप्पड़ का… न उस बहस का…

और न ही उस दर्द का, जो कल पूरे घर में फैल गया था।

समर ने अपना बैग उठाया और बाहर निकल गया। गली में चलते हुए उसे एहसास हुआ कि इंसान जब बाहर हारता है तो फिर भी लड़ लेता है।

लेकिन जब अपने ही घर में हारने लगे…तो लड़ने की ताकत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।

रास्ते भर उसका मन अशांत रहा। ऑफिस पहुँचने के बाद भी उसका ध्यान काम में नहीं लगा। लैपटॉप खुला था, फाइलें सामने थीं, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था। साक्षी का स्वाति को धक्का देना…

उसका थप्पड़… और फिर…

शेखर का बिना कुछ सुने उसे दोषी ठहरा देना। उसने कुर्सी पर सिर टिकाया और गहरी साँस ली।

उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—

“क्या अब मुझे सचमुच साक्षी को कुछ नहीं कहना चाहिए?”

“अगर कल वह कोई और बड़ी गलती कर बैठी… तब भी नहीं?”

“क्या बड़े भाई का रिश्ता केवल शादी तक ही रहता है?”

इन सवालों का जवाब उसके पास नहीं था।

लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हो रहा था कि अगर आज वह चुप हो गया…

तो शायद आगे चलकर यह चुप्पी पूरे परिवार पर बहुत भारी पड़ेगी।

उसे नहीं मालूम था कि आने वाले दिनों में साक्षी की ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है, जहाँ उसे सबसे ज़्यादा उसी भाई की जरूरत पड़ेगी…

जिसे आज उससे दूर रहने की हिदायत दी गई थी।

और शायद…

तब तक बहुत देर हो चुकी होगी…

तो ये कहानी थी “पापा वो मेरी भी बहन है ” , आप लोगो को कैसी लगी अपना प्यार जरूर दे

लेखक & कवि – बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद”

पापा, वो मेरी भी बहन है | बदलते रिश्तों की एक भावुक कहानी Read More »

मोबाइल ने छीना बचपन – बच्चों की मोबाइल की लत पर एक भावनात्मक सामाजिक कहानी

मोबाइल ने छीना बचपन – बच्चों की मोबाइल की लत पर एक भावनात्मक सामाजिक कहानी

सीन -1

शाम का समय है घर के बरामदे में पति पत्नी और उनका एक 8-10 साल का बच्चा है .

तीनो आपस में बहस कर रहे है , पति बच्चे के हाथ से मोबाईल छीनता है और एक थप्पड़ लगाता है ,बच्चा रोने लगता है और मोबाईल उठाकर जमीन पर पटक देता है

फ़्लैश बेक

सुबह का समय है रश्मि टिफिन तैयार कर रही है , रोहित ऑफिस के लिए तैयार हो रहा है

नीचे एक 4-5 साल का बच्चा खेल रहा है और फिर रोने लगता है , रश्मि उसको मोबाईल पकड़ा देती है बच्चा चुप हो जाता है ,

रश्मि –(दीपक को टिफिन पकड़ाते हुए ) अच्छा सुनो शाम को आते हुए पनीर लेते आना, आज आपकी मनपसंद सब्जी बनाउंगी ,

दीपक – (थोडा रोमांटिक होते हुए ) तुम तो जो भी बना दो वही मेरी मनपसंद हो जाती है और उसे किस करने के लिए आगे बढ़ता है

रश्मि – क्या कर रहे हो मुन्ना बड़ा हो गया है सब देख रहा है .

दीपक – अरे जाने मन वो तो मोबाईल में बिजी है , तुम भी न बस

रश्मि हाथो से धक्का देते हुए ठीक है अभी जाओ ……

दीपक चला जाता है , रश्मि घर के कामो में व्यस्त हो जाती है और काफी समय बीत जाता है , बच्चा मोबाइल में विडिओ देख रहा होता है .

घडी की सुई 10 से 12 बजे पर आती है , रश्मि बच्चे के पास जाती है  उसे कुछ खाने को देती है – मेरे  मुन्ना को भूख लगी होगी , उसके हाथ से मोबाइल लेती है और उसे खिलाने लगती है तभी डोर बेल बजती है. रश्मि जाकर दरवाजा खोलती है ..उसकी पड़ोसन रज्जो घर के अन्दर घुसते हुए –

रज्जो – रश्मि अभी तक तुम्हारा घर का काम पूरा नहीं हुआ क्या

रश्मि – अभी जाकर खत्म हुआ है , सारे बर्तन , कपडे पोछा …..  बहुत सारा काम हो जाता है

रज्जो – अरे तुमने सुना नहीं बगल वाली के घर में काम वाली का न चक्कर –

(तभी मुन्ना रश्मि के पास आता है और कुछ बोलने की कोशिस करता है )

रश्मि – मुन्ना को चुप कराते हुए दूर करती है  – हां हां बोल न चक्कर

रज्जो – बगल वाली जो है न उनके पति का चक्कर

(फिर मुन्ना आकर डिस्टर्ब करता है , रश्मि उसे फिर दूर करती है और उसे मोबाइल देकर दूर बिठा देती है )

रज्जो- बगल वाली के पति का चक्कर उसके काम वाली के साथ चल रहा है

(दोनों काफी देर तक गप्पे मारते है , उधर मुन्ना मोबाइल में व्यस्त रहता है ,घडी की सुई 4 बजा रही होती है )

सीन -2

अगले दिन ………

दीपक – आज ऑफिस जाने का मन नहीं है , थोडा सा काम है तो घर से ही कर लूँगा .

रश्मि – ठीक है मैं तब तक सारा काम निपटा देती हूँ

दीपक लैपटाप पर काम करने लगता है , मुन्ना आकर उसकी फ़ाइल को उठाता है ,

दीपक – उसे प्यार से उठाते हुए ,बेटा अभी ये तुम्हारे काम की नहीं है जब काम की होगी न तो हाथ भी नही लगाओगे . (दीपक उसे दूर बिठा देता है )

थोड़ी देर बाद आकर बच्चा फिर डिस्टर्ब करता है , दीपक कुछ गुस्सा होता है फिर उसे मोबाईल पकड़ा देता है

सीन -3

रश्मि घर के बाहर झाड़ू लगा रही होती है , मुन्ना बाहर  ही खेल रहा होता है , सामने से रज्जो मटकते हुए आती है ,

रश्मि – क्या बात है रज्जो आज इतनी जल्दी , काम वाम नही था क्या ?

रज्जो – अरे नहीं दीदी आज मेरे पति और सास ससुर किसी काम से बाहर से गये हुए है शाम तक आयेंगे

तो सोचा तुम्हारे घर के चक्कर लगा लेती हु

(तभी मुन्ना रश्मि के पास आकर बैठता है, कुछ बोलता है , रश्मि उसे चुप कराती है )

रश्मि – रज्जो को बिठाते हुए , अरे चक्कर से याद आया पडोसी के चक्कर के बारे  बताया नहीं

(मुन्ना पास में रखा फोन उठता है और वंहा से खिसक जाता है )

दोनों फिर गप्पे मारने लगते है

सीन -4

दीपक और रश्मि टेबल पर बैठे होते है , मुन्ना जो अब थोडा सा बड़ा हुआ है वो दूसरे बेड पर बैठा हुआ है – बगल में कापी किताब फैला हुआ है और वो मोबाईल में कुछ देख रहा है )

दीपक- रश्मि से शिकायत के लहजे में – देख रही हो अपने लाडले को सारा दिन मोबाईल में लगा रहता है , कापी किताब तो जैसे काटता है ,

रश्मि – इसमें मेरी क्या गलती है आपके ही दुलार ने उसे सर पर बिठा रखा है

दीपक – आवाज देता है – मुन्ना मुन्ना

(मुन्ना उधर देखता ही नहीं है वो तो मोबाईल में लगा रहता है , रश्मि उसके हाथ से मोबाईल छीनकर टेबल पर रखती है , मुन्ना रोता हुआ आता है और टेबल से मोबाईल उठा लेता है , जिसे देखकर दीपक को गुस्सा आ जाता वो मुन्ना को थप्पड़ लगा देता है , और मुन्ना मोबाईल को जमीन पर पटक देता है )…

 

सलाह – आज के सामाजिक परिवेश को देखकर सभी पेरेंट्स से यही कहना चाहता हु की अपने बच्चो को मोबाईल की आदत से दूर रखे , उन्हें पूरा समय दे , उनके साथ समय बिताये न की मोबाईल देकर पीछा छुडाये .

इशारों वाला प्यार – ISHARON  WALA  PYAR

 

 

मोबाइल ने छीना बचपन – बच्चों की मोबाइल की लत पर एक भावनात्मक सामाजिक कहानी Read More »

दादी का प्यार और नौकरी भावुक हिंदी कहानी

दादी का प्यार और नौकरी | दिल छू लेने वाली भावुक कहानी

दादी का प्यार और नौकरी

दृश्य -1

नौकरी और पैसों की दौड़ में कहीं अपने सबसे अनमोल रिश्ते पीछे न छूट जाएँ।आरव कुछ सोच रहा होता है , मैं कितना ही अभागा हूँ या खुदगर्ज हूँ जो सही गलत का फैसला न ले सका , चंद रुपयों की खातिर मैंने रिश्ते को अहमियत नहीं दी और फिर सोच में डूब जाता है

(दादी कुछ अनाज बीन रही है , बहु (शीला ) घर के काम कर रही है एक 7 साल का  बच्चा आस पास में खेल रहा है और फिर दादी के पास जाकर जो अनाज बीन रही है उसे मिला देता है)

दादी – (गुस्से में ) नालायक ये किया सारा किये पर पानी फेर दिया , अब इसे क्या तेरी माँ बीनेगी ,

(बच्चा रोने लगता है ) फिर दादी ही उसे चुप कराती है दुलार करने लगती है .,

शीला – ये दिन पर दिन शैतान होता जा रहा है, स्कूल में नाम लिखा दिया है लेकिन खेलने के आगे कभी पढाई नहीं करता .

आरव (बच्चा) – मम्मी अभी खेलने दो बाद में पढ़ लूँगा न ( और दादी का चश्मा उतारकर पहन लेता है और इधर उधर भागने लगता है लेकिन वो खम्भे से टकरा जाता है और उसके सर में चोट लग जाती है )

शीला आवाज सुनकर दौड़कर आती है , दादी भी आती है दोनों उसे उठाते है उसके सर से खून निकल रहा होता है,  दादी अपना आँचल फाड़कर उसके सिर पर बांधती है ,

दादी– बहु तू अजय को फोन कर के बुला ले लगता है ज्यादा चोट लग गया है, मैं तब तक डाक्टर को बुला कर लाती हूँ

(शीला अजय को फोन लगाने लगती है इतने में दादी डाक्टर को बुलाने भागती है )

दृश्य-2

अजय आता है , आरव बिस्तर पर लेटा है उसके सिर में पट्टी बंधी है, दादी उसके सिरहाने बैठी हुई है ,

अजय – क्या हुआ शीला इसे चोट कैसे लगी .

शीला – कुछ नहीं वो अपनी दादी का चश्मा पहनकर भाग रहा था तो खम्भे से टकरा गया .

अजय – क्या माँ तुम भी न , पता है ये पावर का चश्मा है तो उसे क्यों पहनने दिया , आखिर फोड़ लिया न सर

दादी – बेटा मैंने कब दिया उसने उतार लिया , तो

अजय –  (बात को बीच में काटते हुए ) रोक तो सकती थी न, और शीला तुम्हे तो ख्याल रखना चाहिए था एक बच्चे को सम्भाला नहीं जाता .

(शीला पानी का ग्लास देते हुए, डाक्टर ने बोला है मामूली चोट है दो दिन में ठीक हो जायेगा )

दृश्य -3 

रात का समय है अजय और शीला अपने कमरे में सो रहे है , आरव बिस्तर पर लेता है और दादी अभी भी उसके सिरहाने बैठी हुई है

आरव ( करवट लेते हुए ) – मम्मी – मम्मी प्यास लगी है,

दादी – (तुरंत पानी का ग्लास देते हुए ) ले बेटा पानी पे ले .

आरव – मम्मी कहा है ..

दादी – मम्मी पापा सो गए है , दिन भर काम करके थक जाते है न, अब तू भी सो जा , दर्द तो नहीं हो रहा है न

आरव – थोडा थोडा हो रहा है

दादी – सर पर हाथ फेरते हुए , जल्दी  ठीक हो जायेगा

दृश्य -4 

( आरव बड़ा हो चुका है और शहर में कमाने लगा है )

अजय – (फोन पर ) – हेल्लो बेटा कैसा है

आरव – मैं ठीक हु पापा , आप कैसे है , मम्मी कैसी है

अजय – बेटा हम सब ठीक है , बस तुम्हारी दादी की तबियत ज्यादा ख़राब है , कह रही है आरव को बुला दो

आरव – पापा मै तो आ जाता लेकिन पता है, अभी साल का आखिरी दिन चल रहा है और मेरी सैलरी बढ़ने वाली है , अगर अभी छुट्टी लिया तो मेरा नुक्सान हो जायेगा .

(दादी जो बीमार है और बिस्तर पर लेटी है उसकी आवाज सुनती है , )

दादी – क्या बोला आरव ने

अजय – कुछ नहीं माँ वो आजकल काम ज्यादा है न तो बस

दादी – कोई बात नहीं बेटा शहर में पैसे की बहुत जरुरत पड़ती है  ,

दृश्य -5 

दादी का शव रखा हुआ है , सभी रो रहे है

अजय – (फोन पर )- हेल्लो आरव बेटा

आरव – नमस्ते पापा ,मैं बहुत खुश हूँ , बॉस ने मेरी सेलरी बढ़ा दी है ,ऑफिस में मेरे काम की तारीफ हो रही है

अजय – हा बेटा , वो तो ठीक है लेकिन मैंने ये बताने के लिए फोन किया है अब तेरी दादी इस दुनिया में नहीं रही, आखिरी समय में वो तुझे याद करती रही

आरव दुखी हो जाता है , उसके आँखों में आंसू भर आता है उसके मुंह से शब्द नहीं निकलते है.

अजय – बेटा अगर आ सकता है तो अंतिम दर्शन के लिए आ जा , हम शाम तक ही शव को लेकर जायेंगे .

आरव- जी पापा मैं आ रहा हूँ मेरे आने तक इंतजार करना ( फोन रखता है और बिलख बिलख कर रोने लगता है )

 

 

 

आजकल हम पैसे और नौकरी में इतने ब्यस्त हो जाते है की हमें रिश्ते की अहमियत कम लगने लगती है , ऐसा हर किसी के साथ होता है , लेकिन सही मायने में हमें अपने रिश्ते को अपने उस वृद्ध हो चुके दादा दादी को यूँ ही नजरअंदाज नहीं करना चाहिए , क्योकि ये वही पेड़ है जिनकी छाया में तुम फलते फूलते रहे .

दादा जी दादा जी मुझको फिर से गले लगाओ न

दादी का प्यार और नौकरी | दिल छू लेने वाली भावुक कहानी Read More »

इशारों वाला प्यार – ISHARON WALA PYAR 

इशारों वाला प्यार – ISHARON  WALA  PYAR

 

प्यार की भाषा का कोई शब्द नहीं होता इसलिए इशारो में प्यार हो जाता है, आइये आपको इशारो वाला प्यार  (ISHARON WALA PYAR ) की कहानी सुनाता हूँ. –

सुबह का समय है, मौसम बहुत ही खुशनुमा है, मंद मंद हवा चल रही है । कुछ जोड़े इधर – उधर बांहों में बाँहे डालकर घूम रहे है । बुजुर्ग दम्पति भी खुली हवा में  सांस लेते हुए व्यायाम कर रहे है ।

एक लड़की अकेली दौड़ लगा रही है, लेकिन उसका ध्यान किसी की तरफ न होकर एक दम शांत है । बगल से एक लड़का कानो में हेडफोन लगाकर दौड़ता हुआ निकलता है लेकिन दोनों की कोई प्रतिक्रिया  नहीं । अगले दिन फिर दोनों दौड़ते हुए आमने सामने टकराते है लेकिन किसी की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती । मानो दोनों में से किसी को एक दूसरे में दिलचस्पी न हो । धीरे – धीरे  एक महीना बीत जाता है और दोनों रोज ही एक बार आपस में टकराते जरुर है ।

फिर एक दिन वो लड़का उस लड़की को प्रपोज करता है । देखो मैं तुम्हे रोज देखता हूँ, शुरू में तो लगा की हम ऐसे ही एक दूसरे से टकरा गए,  लेकिन रोज –रोज मिलने से मैंने तुम पर ध्यान देना शुरू कर दिया । एकदम शांत स्वाभाव, किसी तरह की कोई दिखावा नहीं, अपने आप में खोयी सी रहती हो, फिर पता नहीं क्यों मेरे दिल में एक अजीब सा हलचल हुआ और फिर मै तुम्हारे प्रति आकर्षित होने लगा ।

शुरू में तो मैंने सोचा की 2- दिन में सब खत्म हो जायेगा , लेकिन मैं मन ही मन तुमसे प्यार कर बैठा । मुझे न तुम्हारा नाम मालूम, न पता मालूम, तुम करती क्या हो , परिवार वैगरह आदि । फिर भी मैंने हिम्मत जुटाई और आज तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ!

क्या तुम मेरा साथ दोगी , सदा सदा के लिए 

वो लड़की हतप्रभ उसे दखते रह गयी , परन्तु उसके आँखों के एक कोने से पतली सी आंसू की धारा  बह निकली । उसके इस व्यवहार से लड़के को बड़ा दुःख हुआ की कही उसने कोई गलती तो नहीं कर दी । फिर भी उसने अपने आप को संभाला और बोला देखो कोई जबरदस्ती नहीं है, अगर तुम नहीं चाहती तो मना कर सकती हो ।  फिर लड़की ने जो इशारा किया उसे देखकर लड़के की मनोदशा विचलित हो गयी , दरअसल वो लड़की बोल नहीं सकती थी । उसने इशारे में उसे समझाया की मैं गूंगी हूँ और तुम्हारा साथ कैसे दे पाऊँगी ।

लड़का कुछ सोचते हुए , आँखों में आंसू लेकर भारी कदमो से वंहा से चला गया । लड़की उसे दूर जाते देखकर फूट फूट कर रोने लगी ।

उसके बाद अगले दिन फिर वो लड़की उसी पार्क में घूमने आयी परन्तु वो लड़का दिखाई नहीं दिया ।

समय बीतता गया  15 दिन से ज्यादा हो गए परन्तु वो लड़का दिखाई नही दिया  । लड़की ने उसे भूल जाना ही बेहतर समझा ।

इसे भी पढ़े : चेहरा – (दाग चेहरे पर नहीं दिल में है )

फिर एक  दिन वो रोज की तरह उसी पार्क में घूमने आयी , और अभी बगल में रखी बेंच पर बैठी ही थी की सामने से वही लड़का हाथ में गुलदस्ता लेकर आता हुआ दिखाई दिया । उसके पास आकर लड़के ने कुछ इशारा किया बदले में उस लड़की ने भी इशारे में उसका जवाब दिया ।

लड़के ने वो गुलदस्ता उस लडकी के हाथो में दिया जिसे उसने तुरंत स्वीकार किया और उससे लिपट गयी ।

दरअसल बात ये हुई की  लड़का उस लडकी को दिल से चाहने लगा था , लेकिन जब उसे पता चला की वो बोल नही सकती तो वो निराश हो गया । फिर उसने वो भाषा सीखी जिससे वो इशारे में उससे बात कर सके । और आज वो न की उसकी बात को समझ सकता था बल्कि अपनी बात भी कह सकता था ।  ये जानकार उस लकड़ी की आँखों से आंसुओ के धार  बह निकले,  वो उससे लिपट कर रोने लगी ।

लड़के ने उसे इशारे इशारे में समझाया की लोग हमें देख रहे है , ये देखकर वो लड़की मुसकरयी और फिर दोनों हाथो में हाथ डालकर वंहा से निकल गए ।

और इस तरह से इशारों वाला प्यार इशारों ही इशारों में परवान चढ़ जाता है ।

इशारों वाला प्यार – ISHARON WALA PYAR  Read More »

चेहरा – ( दाग चहरे पर नहीं दिल में है) 

(पात्र – सिद्धांत- २५ साल, मुस्कान- २२ साल, बिक्रांत- २५ साल, सार्थक- ३५ साल )

दृश्य- १

एक लड़का और लड़की स्कूटी से जा रहे है, दोनों बहुत खुश लग रहे है आपस में बाते करते हुए हंस रहे है I

इतने में सामने से एक लड़का इशारा करता है,  लड़की पलट कर देखती है जो उसका कोई पुराना दोस्त होता है I

लड़की स्कूटी चला रहे लड़के से बोलती है I

लड़की- अरे सिद्धांत  उधर देखो मेरा पुराना दोस्त है, स्कूटी घुमाओ जल्दी I

और इसी हडबडाहट में स्कूटी  टकरा जाती है ,  लडकी तो बच  जाती है पर लड़के के मुंह  पर चोट  लग जाती है I

बगल से एक और युवक जा रहा होता है थोड़े से फटेहाल में है , एक्सीडेंट देखकर रुक जाता है I

युवक – अरे जल्दी से इन्हें हास्पिटल ले चलो , खून ज्यादा बह रहा है I

फिर सभी उसे हॉस्पिटल लेकर चले जाते है I

दृश्य - २

सिद्धांत,  जिस लडके  को चोट लगी थी बिस्तर पर लेटा हुआ है उसके चेहरे पर ज्यादा चोट लगने के कारण चेहरे पर दाग आ गया है I

इतने में लड़की उसी पुराने दोस्त के साथ उससे मिलने आती है उसके चेहरे पर दाग देखकर थोडा चौंकती है लेकिन खुद को सम्भाल  लेती है

मुस्कान – ये दाग अभी तक ……  डाक्टर ने क्या बोला … ये ठीक तो हो जायेगा न ?

सिद्धांत – शायद नहीं होगा , डाक्टर साहब कह रहे थे की दाग ऐसा ही रहेगा अगर ठीक करना है तो प्लास्टिक सर्जरी करवानी पड़ेगी I और तुम तो जानती ही हो की इतनी महंगी सर्जरी मैं करा नहीं सकता I

मुस्कान – मन ही मन तेरी औकात ही इतनी कहाँ I

सिद्धांत – तुम कुछ कह रही हो शायद I

मुस्कान – (हडबडाते हुए) नहीं कुछ नहीं I तुम जल्दी ठीक हो जाओगे I

बिक्रांत (लड़की का दूसरा दोस्त)  – अब चलते है हमें देर हो रही हैI तुम्हारे दुकान का कागज भी सही करवाना है I

 सिद्धांत –क्या  बात बात है मुस्कान, कुछ दिक्कत है क्या ?

मुस्कान- नहीं कुछ नहीं तुम आराम करो I बिक्रांत है न ! सब संभाल लेगा I

मुस्कान , बिक्रांत का हाथ पकड़कर वंहा से चली जाती है I

 

सिद्धांत उसे जाते हुए देखता है , फिर बगल में रखी किताब पढने लगता है I

दृश्य - ३

सिद्धांत कुर्सी पर बैठकर किताब पढ़ रहा होता है इतने में फोन की घंटी बजती है I

सिद्धांत- हैलो (उधर से एक लड़की की आवाज आती है )- अरे मुस्कान तुम …. कैसी हो I

मुस्कान और उसका दोस्त बिक्रांत दोनों बाइक पर होते है I

मुस्कान- सिद्धांत मैं कुछ कहना चाहती थी, वो मै ……मै …… तुम्हारे साथ ..

सिद्धांत- बोलो क्या बात  है , रुक क्यों गयी ?

(उधर बिक्रांत बोलता है उससे पूछ उसका चेहरा कैसा है अब)

मुस्कान- तुम्हारा फेश कैसा है अब, दाग सही तो नहीं हुए होंगे ?

सिद्धांत- नहीं, मैंने तो बताया तो था की सर्जरी से सही हो जायेगा I

मुस्कान- हां मालुम है और वो कभी नहीं होगा, तो मै……. मैं  नहीं चाहती की कल को अगर मैं तुम्हे किसी से मिलवाऊ तो लोग पता नही क्या कहेंगे

सिद्धांत- क्या – क्या? मैं  समझा नहीं ?

बिक्रांत ,( मुस्कान के हाथ से मोबाइल छीन लेता है)- सुन भाई अब मुस्कान तेरे साथ नहीं रह सकती , कुछ दिनों बाद हम शादी कर रहे है I अब तू उसे हमेशा के लिए भूल जाना I और फ़ोन काट देता है I

सिद्धांत थोडा मायूस हो जाता है लेकिन फिर किताब पढने लगता है I 

दृश्य- ४

दफ्तर का दृश्य है I एक क्लर्क बाहर बैठा कुछ काम कर रहा है I

इतने में बिक्रांत और मुस्कान उस आफिस के सामने आते है I उनके हाथ में कुछ पेपर है I दोनों बहुत परेशान लग रहे है I

मुस्कान- हमें साहब से मिलना है बहुत अर्जेंट है I

क्लर्क  – आपके पास साहब का अपॉइंटमेंट है क्या ?

बिक्रांत- नहीं हमारे पास नहीं है I

क्लर्क – तो फिर साहब नहीं मिल सकते I एक काम करो अपना पेपर छोड़ जाओ और नाम और नम्बर भी, मैं आपको एक दो दिन में बुला लुंगा I

मुस्कान- नहीं हमें बहुत जरूरी है , अगर साहब ने हस्ताक्षर नहीं किये तो हम सड़क पर आ जायेंगे I हमारा दुकान नीलाम हो जायेगा I

दोनों हाथ जोड़कर गिडगिडाने लगते है I

क्लर्क  – अच्छा रुको मैं देखता हूँ I

(अन्दर बैठा व्यक्ति इनकी बाते सुन लेता है और आवाज देता है , सार्थक उन दोनों को अन्दर ले आओ I

 दोनों अंदर जाते है और चौक जाते है I सामने कुर्सी पर सिद्धांत बैठा होता है I

मुस्कान- तुम और यंहा , इस कुर्सी पर …

सार्थक (क्लर्क ) – मैडम तुम नहीं आप कहो , यही है यहाँ के नए आफिसर I

सिद्धांत- जी हाँ मैं, तुम्हे तो पता ही होगा की मैं UPSC की तयारी कर रहा था I पहले तो मेरे पास समय बहुत कम होता था पढने के लिए , लेकिन  जब तुम मुझे छोड़कर चली गयी तो मैं  पूरी तरह से फ्री हो गया I मैंने पूरा समय पढाई में लगाया और आज इस ओहदे पर पंहुचा गया I

मुस्कान- सॉरी सिद्धांत… मुझे माफ़ कर दो I मैंने तुम्हारे साथ गलत व्यव्हार किया I

और दूसरी तरफ मुस्कराते हुए क्लर्क  को देखकर , तुम तो वही हो न जो उस दिन एक्सीडेंट में हमारी मदद किया था I

सार्थक – हाँ मैं वही हूँ, एक दिन किसी काम से साहब हमारे गावं में आये थे ,मैं बेरोजगार था, साहब ने मेरा हालचाल पूछा और यहाँ  नौकरी दे  दिया I

बिक्रांत – परन्तु आपके चेहरे पर दाग था न ?

सिद्धांत- मैंने सर्जरी करवा लिए, सोचा एक तो चली गयी कही ऐसा न हो की दूसरी मिले ही न और हंसने लगता हैI

इतने में दोनों वापस जाने लगते है , उन्हें वापस जाता देखकर सिद्धांत उन्हें रोकता है I

सिद्धांत- रुको तुम्हारा कोई काम था न, लाओ मैं साइन कर देता हूँ I

मुस्कान उसे पेपर देती है , सिद्धांत पेपर चेक करता है, और वापिस कर देता है I

सिद्धांत- सॉरी मैडम मैं इस पर साइन नहीं कर सकता I ये अवैध है,  हाँ अगर कुछ और सहायता चाहिए तो सार्थक को बोल देना I

दोनों मायूस होकर चले जाते है I

 सिद्धांत कुर्सी पर बैठकर काम करने लगता है और सार्थक बाहर अपनी जगह पर ……………..       


इसे भी पढ़े : पागल- हर इन्सान की अपनी अहमियत है 

चेहरा – ( दाग चहरे पर नहीं दिल में है)  Read More »

पागल

 

पात्र – पागल, पति – पत्नी और बच्चा

२-४ बच्चे ,दुकानदार और भीड़ 

दृश्य -१

एक व्यक्ति फटे पुराने कपडे पहने हुए, बिखरे हुए बाल, शरीर पर कीचड लगा हुआ, मनो कितने दिनों से नहाया नहीं हुआ था, सड़क पर चले जा रहा है।  किनारे से छोटे छोटे बच्चे पागल पागल कहते हुए , कोई उस पर कंकड़ मार रहा है तो कोई दूर से ही चिढ़ा रहा है।

और वो व्यक्ति अपने ही धुन में चले जा रहा है बिना किसी का जवाब दिए हुए

एक दुकान के पास  एक महिला अपने छोटे बच्चे के साथ खड़ी है, बच्चा हाथ में एक ब्रेड का टुकड़ा लेकर खा रहा है।

पागल – इशारे से ही उस औरत से कुछ खाने के लिए बोलता है /

औरत – चल दूर हट यहाँ से , पागल कहीं का। 

पागल- (बच्चे के तरफ देखते हुए- अपने पेट पर हाथ फिरता हुआ ) मुझे भूख लगी है , कुछ खिला दो

(छोटा बच्चा उस आदमी की तरफ देखते हुए ब्रेड का टुकड़ा बढ़ा रहा होता है की वो औरत बच्चे को खींच कर दूसरी तरफ ले जाती है, और वो ब्रेड का टुकड़ा वही जमीन पर गिर जाता है )

औरत मन में गालिया बकते हुए वहां से चली जाती है , दुकान दार उस पागल की तरफ डंडा लेकर दौड़ता है, चल  भाग यंहा से।

पागल उस गिरे हुए ब्रेड के टुकड़े को उठा कर खाने लगता है और धीरे धीरे वंहा से चला जाता है।

दृश्य –

अगले दिन वही पागल व्यक्ति एक कॉलोनी की तरफ पहुँच जाता है तो देखता है की वही बच्चा बाहर हाथ में बिस्कुट लेकर खा रहा होता है और बगल में उसके पापा बैठे हुए है।

बच्चे को देखकर पागल इशारा करता है , बच्चा धीरे धीरे उसके पास जाने लगता है।

बच्चे का पिता उसे जाते हुए देखता है तो रोकता है

पागल- साहब कुछ खाने को दे दो, बहुत भूख लगी है।

पिता- ठीक है दूर रहो , मै कुछ मंगाता हूँ।  (और घर के दरवाजे पर जाकर आवाज लगाता है )          

सुनती हो , जरा कुछ खाने के लिए ले आना, बेचारा भूखा है।

इतने में वो बच्चा बिस्कुट का पैकेट उसे दे देता है।

पिता अपने बच्चे के इस हरकत को देखकर मुस्करा देता है

इतने में एक औरत हाथ में रोटी लेकर बाहर आती है और उस पागल को देखकर भड़क उठती है।

औरत – तो इस पागल के लिए आप रोटियां मंगा रहे थे।

पिता- तो क्या हुआ आखिर वो भी तो इंसान ही है, दो रोटी खिला दोगी तो तुम्हारा कुछ बिगड़ नहीं जायेगा।

औरत- हां हां क्यों नहीं सरे पागलो को यही बुला लो, धर्मशाला खोल रखा है न, और उस पागल को वंहा से भगा देती है ,

पागल बिस्कुट का टुकड़ा खाते हुए उस बच्चे को देखता है और वंहा से चला जाता है।

दृश्य –

शाम का समय है , पति , पत्नी और बच्चा गाड़ी में बैठकर बाजार जाते है।

बाजार पहुँच कर पति,  पत्नी और बच्चे को गाड़ी से उतार देता  है।

पति – यहीं पर रुको मै गाड़ी को पार्किंग में लगाकर आता हूँ।

औरत अपने बच्चे के साथ उतर जाती है , पति गाड़ी लेकर चला जाता है।

दोनों माँ और बच्चे सड़क के किनारे ही खड़े है , इतने में औरत के फ़ोन की घंटी बजती है और वो फोन पर किसी से बात करने लगती है ,

बातो बातो में वो बच्चे का हाथ छोड़ देती है और इधर उधर टहलते हुए बात करने लगती है।

इतने में बच्चा सड़क पर पहुंच जाता है , अचानक एक जोर से टकराने की आवाज आती है , तो उस औरत का ध्यान उधर सड़क की तरफ जाता है , लोगो की भीड़ जमा हो जाती है ,

उधर तब तक पति भी वहां पहुंच जाता है और पूछता है अपना बच्चा कहाँ है।

दोनों घबरा कर उस भीड़ के पास पहुंच जाते है तो देखते है की उनका बेटा घबराया हुआ रो रहा है , और बगल में एक व्यक्ति की लाश पड़ी हुई है , जब उसके शरीर को सीधा करते है तो ये वही पागल होता है।

फ़्लैश बैक

(जब बच्चा सड़क पर जा रहा होता है तो दूर वही पागल खड़ा होता है, गाड़ी को उसके पास जाते देखकर उस बच्चे को बचाने की कोशिश करता है लेकिन खुद ही उसकी चपेट में आ जाता है। )

अंतिम दृस्य

औरत को अपने किये हुए बर्ताव पर बहुत पछतावा होता है, और रोने लगती है ,

औरत- मैंने बहुत बुरा बर्ताव किया इसके साथ और आज इसने मेरे बच्चे की जान बचाने के लिए अपनी जान गावं दी।

पति- बिलकुल सही कहा , हमें किसी भी व्यक्ति के साथ दुर्व्यहार नहीं करना चाहिए आखिर वो भी तो इंसान ही होते है, पता नहीं अपनी किस गलती और हालात के कारण उनकी ऐसी स्थिति हो जाती है , हमें चाहिए की ऐसे लोगो के साथ सहानुभूति रखे और कभी किसी को कष्ट न पहुचांए। 

पागल Read More »

शिक्षा हर बच्चे का हक़ है

दृश्य -१

एक छोटा सा घर है,  माँ चूल्हे पर खाना बना रही है, एक छोटा सा बच्चा जमीन पर बैठकर अपना होमवर्क पूरा कर रहा है

तभी एक युवक प्रवेश करता है

पिता- (शराब के नशे में झूमते हुए)- ऐ सोनू जल्दी से पानी लेकर दे

सोनू- पापा मै होमवर्क पूरा करके देता हूँ अभी

पिता- बड़ा आया कलक्टर बनने, जल्दी ला मेरा गला सूख रहा है

पत्नी- क्यों चिल्ला रहे हो उसे अपना होमवर्क पूरा करने दो, उसका इम्तिहान आने वाला है

पति- पढ़ लिख कर क्या कर लेगा, करनी तो मजदूरी ही है, आज तक पूरे खान दान में कोई भी पढ़लिखकर एक चपरासी तक तो नहीं बना I

रसोई से पत्नी पानी का गिलास लेकर आती है, पानी का गिलास थमाते हुए

पत्नी (सुनीता )- लीजिये पानी, बच्चे पर क्यों गुस्सा कर रहे है उसे पढ़ने दीजिये, , प्रिंसिपल कह रहे थे की आपका सोनू पढ़ने में बहुत तेज है उसे खूब पढ़ाना

पति- (पानी का गिलास दूर फेकते हुए) इसका फीस कौन तेरा बाप भरेगा, मेरे पास इतने फालतू पैसे नही है

और पैर पटकते हुए बाहर निकल जाता है

सोनू सहम जाता है और सिसकने लगता है

माँ अपने बेटे को गले लगते हुए – बेटा तू रोता काहे को है , मै तुझे पढ़ाऊंगी, जब तक तू पढ़ना चाहे।

सोनू- मगर मम्मी आप फीस के पैसे कहाँ से दोगी। 

सुनीता-   तू चिंता मत कर बेटा , मै मजदूरी करुंगी , घरो में चौका बर्तन करुँगी, लेकिन तुझे जरूर पढ़ाऊंगी,

तू सिर्फ अपने पढाई पर ध्यान देना।

दृश्य -२

सुनीता अलमारी में कपडे तह करके रख रही होती है और उसे ततः में कुछ पैसे रखती है बच्चे के फीस के लिए

इतने में पीछे से पति आ जाता है और वो पैसे को देख लेता है

पति- मुझे कुछ पैसे चाहिए बहुत जरूरी काम  है

सुनीता- क्या जरूरी काम आ गया अब? ये पैसे सोनू के फीस के लिए है

पति -पैसे छीनते हुए , बड़ी आई फीस जमा करने वाली क्या करेगा पढ़कर ।  सुबह से जी मचल रहा है, बड़े जोर की तलब लगी है

सुनीता- हाँ हाँ जी तो घबराएगा ही , सुबह से पीने को नहीं मिली न, दो दिन से काम पर भी नहीं जा रहे हो, इतना खर्चा है कैसे गुजारा होगा।

पति- (तंज कसत्ते हुए ) अरे अब तो तू कमा रही है न , अब पैसे की कैसी कमी,  अपने लाला को बोलकर कभी भी  हजार दो हजार तो ला ही सकती है न

सुनीता- कैसे मर्द हो आप, आपको तो समझाना भी सर को पत्थर पर मरने जैसा है

(पति फिर भी पैसे लेकर चला ही जाता है , सुनीता मायूस होकर घर के कोने बैठ जाती है और भाग्य को कोस रही होती है , पता नहीं कब  इन्हे अक्ल आएगी )

इतने में सोनू बस्ता लेकर घर में प्रवेश करता है

सोनू- मम्मी मम्मी कहाँ हो ? बस्ता एक किनारे रखता है

सुनीता- ( आंसू पोछते हुए ) आ गया मेरा बेटा, चल हाथ मुँह धो ले मै तेरे लिए खाना निकाल देती हूँ,

(बेटा खाना खाते हुए)

सोनू- मम्मी , आज प्रिंसिपल सर कह रहे थे अगर कल तक फीस नहीं जमा किया तो मै इम्तिहान में नहीं बैठ पाउँगा,

सारे बच्चो की फीस जमा हो गयी है।

सुनीता- तू फिक्र मत कर बेटा तेरी फीस का बंदोबस्त हो जायेगा, मै कल फीस जरूर जमा करा दूंगी।

दृश्य -३

(रात का दृश्य है, तीनो सो रहे होते है , पति बक बक कर रहा होता है)

पति- सुनती हो मैंने आज चौराहे पर चाय वाले से बात कर ली है , एक दिन के १५० रूपये देने के लिए बोल रहा था, कल से सोनू चाय की दुकान पर जायेगा, और वैसे भी तो पढ़लिखकर मजदूरी ही तो करनी है , फिर पैसे क्यों बर्बाद करना I

(पत्नी कोई जवाब नहीं देती )

(पति के सोने के बाद , सुनीता एक संदूक खोलती है उसमे उसकी माँ के दिए हुए कंगन होते है, और उसे अपने पल्लू में बांधकर सो जाती है

सोनू बगल में सो रहा होता है,  )

सुनीता- (सोनू  के सिर पर हाथ फिराते हुए) – मेरा बेटा जरूर पढ़ेगा चाहे उसके लिए मुझे कितनी भी तकलीफ उठानी पड़े।

दृश्य -४

पति अभी तक सो रहा होता है

माँ- बेटा मै आज तेरा फीस जमा कर दूंगी , तू बस मन लगाकर अपनी परीक्षा की तैयारी कर

सोनू- ठीक है मम्मी।

दृश्य -५

आज रिजल्ट का दिन है

सोनू- माँ आज मेरा रिजल्ट आएगा, सर ने बोला है अपने मम्मी पापा को लेकर आना , आप दोनों को भी चलना है,लेकिन पापा तो अभी तक सो ही रहे है।

सुनीता- सुनते हो जी आज अपने बेटे का रिजल्ट आने वाला है, आज तो साथ में चलो, सारे बच्चो के माँ बाप आये होंगे

पति- जाओ अपने लाटसाहब को लेकर , बहुत बड़ा तीर मारा होगा इसने, मै नहीं जाऊंगा मेरे पास समय नहीं है I

माँ बेटा दोनों स्कूल के लिए निकल जाते है ,

 पिता कुछ देर बाद घर से बाहर निकलता है , सामने से पडोसी अपने बच्चे को लेकर स्कूल जाते हुए पूछता है भाई आप स्कूल नहीं जा रहे हो क्या ? आज बच्चो का रिजल्ट आने वाला है , आप भी आ जाना। 

पिता कुछ सोचता है और बेमन से स्कूल के लिए निकल देता है

दृश्य -६

स्कूल का दृश्य

सारे बच्चे अपने माता पिता के साथ बैठे हुए है, स्कूल का सारा स्टाफ बैठा हुआ है, रिजल्ट की घोषणा की जाती है और सोनू पूरे स्कूल में प्रथम श्रेणी (टॉपर) आता है , सुनीता की आँखों से आंसुओ की धारा बह रही होती है , उधर सबसे पीछे पिता एक कोने में यह दृश्य देखकर भावुक हो उठता है।

प्रिंसिपल- बेटा आज तुमने अपना और अपने माता पिता का नाम रोशन किया है, पूरे स्कूल को तुम्हारे ऊपर गर्व है , तुम्हारी इस छमता को देखते हुए प्रशाशन ने तुमको आगे की पढाई के लिए स्कोलरशिप (छात्रवृति) देने का फैसला लिया है

पिता धीरे धीरे अपने बच्चे के पास आता है और हाथ जोड़कर बेटे से माफ़ी मांगता है

पिता- बेटा मुझे माफ़ कर दे मैंने पढाई की कीमत नहीं समझी, सुनीता तुम भी मुझे माफ़ कर दो मैंने तुम पर बहुत जुल्म किये है,

लेकिन अब मेरी आँख खुल गयी है, मै वादा करता हूँ आज के बाद कभी शराब को हाथ नहीं लगाऊंगा , और दिन रात मेहनत करके अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाऊंगा

प्रिंसिपल- बहुत अच्छी बात है आज आपकी आँखे खुल गयी, सोनू जैसे न जाने कितने बच्चे है जो अपने माता पिता के जागरूक न होने के कारण पढ़ लिख नहीं पाते और बाल मजदूर बनकर रह जाते है,

आज से मै अपने स्कूल प्रशाशन को यह निवेदन करूँगा की ऐसे बच्चे जो पढ़ना चाहते है परन्तु किसी कारण से स्कूल की फीस नहीं दे पाने की वजह से पढाई नहीं कर पाते उन सभी बच्चो को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी।

और साथ में नशे को बंद करने की भी मुहीम चलायी जाएगी ताकि कोई दूसरा अपने मेहनत के पैसे को यूँ ही बर्बाद न करे और अपने परिवार का पालन पोषण अच्छे से कर सके। 

इसे भी पढ़े – एक सौतेली माँ

शिक्षा हर बच्चे का हक़ है Read More »

सौतेली माँ…

कमलदीप अपनी पत्नी और एक बेटी के साथ एक छोटे से गांव में रहता था। पूरा परिवार सुखपूर्वक रहता था। बेटी कला अभी पांच वर्ष की थी। कमलदीप एक सेठ के दुकान पर नौकरी करता था। पत्नी कमला घर के काम काज के साथ गांव में छोटे मोटे काम कर लेती। सब कुछ सही चल रहा था। अचानक एक दिन मानो उस घर को जैसे किसी की नजर लग गयी। कमला की तबियत ज्यादा खराब हो गयी। गांव में काफी इलाज के बाद भी जब हालत में सुधार नही हुई तो कमलदीप उसे लेकर शहर आ गया। शहर में उसके एक दूर के रिश्तेदर रहते थे। उन्होंने उनकी मदद की और एक अच्छे अस्पताल में भर्ती करा दिया। लेकिन हालत में सुधार होने की बजाय और खराब हो गई। सात दिन बाद उसका शरीर शांत हो गया। बेटी और पिता दोनों सिरहाने के पास मौन खड़े थे, उनकी दुनिया खत्म हो चुकी थी। आंखों से सिर्फ आंसू की धारा बहती जा रही थी।

बुझे मन से उसका अंतिम संस्कार किया। आस पास के लोगों ने उसे सान्त्वना दिया। औऱ फिर सब अपने-अपने जिन्दगी में व्यस्त हो गए। कुछ दिन बीतने के बाद उसने सोचा कि क्यो न शहर में ही रहकर कुछ काम किया जाए। गांव में अब उसे जाना अच्छा नही लग रहा था । रिश्तेदार ने उसे एक किराये का कमरा दिला दिया और एक सेठ से बात करके काम भी लगवा दिया।

सब कुछ फिर सामान्य सा हो गया था । लोगों ने समझाया कि बेटी की उम्र अभी छोटी हैं, उसे दूसरी शादी कर लेनी चाहिए। लेकिन उसने उनकी बातों को अनसुना कर दिया। एक दिन उसी रिश्तेदार के घर एक महिला आयी। उन्होंने उन दोनो की मुलाकात कराई और शादी का प्रस्ताव रखा, उनके बहुत से अहसान थे कमलदीप पर इसलिए वह मना भी न कर सका। एक निश्चित दिन पर दोनों शादी के बंधन में बंध गए।

पूरा परिवार फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। पहले तो कमलदीप को चिंता सता रही थी कि दूसरी माँ मेरी बेटी का खयाल रखेगी या नही। लेकिन अब वह निश्चिंत हो गया था। उसकी बेटी भी नई मां के साथ घुल मिल गयी। कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन धीरे धीरे नई पत्नी के व्यवहार में बदलाव आने लगा। वह पति का भी ध्यान नही रखती। कमलदीप ने सोचा कि कोई बात नही, कम से कम मेरी बेटी तो खुश है,उसे अपनी माँ की याद नही आयेगी।

एक दिन कमलदीप काम से जल्दी आ गया। घर पहुँच कर देखा तो उसकी बेटी बिस्तर पर मुँह छिपाकर सिसक रही है। उसने पूछा तुम्हारी माँ कहाँ है, तो उसने बताया की वह तो रोज ही कही चल जाती है। कमलदीप ने सोचा रिश्तेदार के घर गयी होगी।

फिर कुछ सोचकर उसने बेटी से सवाल किया , क्या तुम्हारी नई माँ तुम्हारा ख्याल वैसे ही रखती है जैसे सगी मां करती थी। फिर बेटी ने जो जवाब दिया उसे सुनकर मानो उसे विश्वास नही हुआ!

बेटी ने कहा पहले वाली मां झूठ बोलती थी और उन्हें गिनती भी नही आती थी, लेकिन नई माँ सच बोलती है और पढ़ी लिखी भी है। पिता हैरान होकर पूछा क्यो बेटी ऐसा क्यों कह रही है।” बेटी ने बताया पहले जब मैं कोई शरारत करती तो माँ कहती थी आज कुछ खाने को नही दूंगी लेकिन कुछ देर बाद वह अपने हाथों से मुझे खिलाती थी। अगर मैं उससे एक चॉकलेट या कुछ भी मांगती तो तीन चार देती थी। लेकिन नई मां जब कहती कि खाना नही दूंगी तो वह दिन भर कुछ भी नही देती और कुछ मांगने पर उतना ही गिनकर देती।”

बेटी के इस दास्तान से उसका कलेजा हिल गया। उसने निश्चित किया कि कुछ भी हों वो उससे रिश्ता तोड़ देगा। और गांव वापिस चला जायेगा।

सौतेली माँ… Read More »

कोरोना चक्र – एक प्रेम कथा

सूनी पड़ी है सड़के , मंजर है तनहा तनहा

सुबह का समय , सूरज की किरणे खिड़की के रास्ते सीधे कमरे में प्रवेश कर रही थी। बाहर चिडियो के चहचहाने और बच्चो के खलेने की शोर भी सुनाई दे रहे थे। समर्थ वो समर्थ जल्दी उठ जा कितना दिन चढ़ आया है,अभी तक सो रहा है, चिल्लाते हुए माँ की आवाज कानो में पड़ी तो वो झट से उठ बैठा। क्या माँ इतनी जल्दी जगा दिया, आज तो कालेज भी नहीं जाना है, शिकायत के लहजे में बोला और वाशरूम की तरफ बढ़ गया। सुबह के नौ बज चुके थे , डाइनिंग टेबल पर समर्थ और उसकी माँ के साथ एक छोटा बच्चा भी बैठा थ। अरे सनी सुबह इधर कैसे आ गया, पूछा समर्थ ने। उसकी माँ ने बोला ये सुबह से तीन बार आ चुका है, शायद तमन्ना को कोई किताब चाहिए थी इसलिए भेजा है। तमन्ना का छोटा भाई है सनी।

कोरोना चक्र – एक प्रेम कथा Read More »