पापा, वो मेरी भी बहन है | बदलते रिश्तों की एक भावुक कहानी
बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद ” की कलम से
बदलते रिश्तो की कहानी – ये कहानी एक भाई की कहानी है जैसा की आज का माहौल है की शादी के बाद बेटी परायी हो या न हो लेकिन बेटे को जरुर पराया समझ लिया जाता है-
भाग – 1 : बदलते रिश्तों की आहट

शाम धीरे-धीरे अपने आँचल में पूरे मोहल्ले को समेट रही थी। दिनभर की चहल-पहल अब सन्नाटे में बदलने लगी थी। दूर कहीं मंदिर की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं और गली में खेलते बच्चों की आवाज़ें भी अब कम हो चुकी थीं। हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी, लेकिन उस घर के बरामदे में माहौल बिल्कुल उल्टा था। वहाँ गर्मी मौसम की नहीं, रिश्तों की थी।
घर के बाहर रखी पुरानी कुर्सी पर शेखर चुपचाप बैठा था। उसके चेहरे पर दिनभर की मेहनत की थकान साफ दिखाई दे रही थी। उसकी नज़रें सामने सड़क पर थीं, लेकिन मन शायद कहीं और भटक रहा था। उसे इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसके अपने ही घर के अंदर कुछ ऐसा होने वाला है, जो आने वाले समय में पूरे परिवार के रिश्तों की दिशा बदल देगा।
घर के अंदर अपने कमरे में समर किसी जरूरी काम में व्यस्त था। उसके सामने खुला लैपटॉप था और पास ही कुछ कागज़ रखे थे। वह पूरी कोशिश कर रहा था कि अपना काम समय पर पूरा कर ले। बाहर से आती आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं, लेकिन उसने सोचा कि घर की छोटी-मोटी बात होगी और थोड़ी देर में सब शांत हो जाएगा।
बरामदे में स्वाति और साक्षी आमने-सामने खड़ी थीं।
दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहस शुरू हो चुकी थी।
शुरुआत में आवाज़ें धीमी थीं, लेकिन देखते ही देखते बात इतनी बढ़ गई कि घर की दीवारें भी जैसे उन शब्दों की गवाह बन गईं।
साक्षी ने गुस्से में कहा,
“आप अपने काम से काम रखिये, मेरी माँ बनने की कोशिश मत करो।”
उसकी आवाज़ में सम्मान से ज़्यादा तकरार थी।
स्वाति ने अपने गुस्से को दबाते हुए शांत स्वर में कहा,
“देखो साक्षी, मैं तो बस तुम्हे समझा रही थी, की पढ़ाई पर ध्यान दो, इन फालतू के चक्करों में मत पड़ो।”
वह डाँटना नहीं चाहती थी। वह केवल इतना चाहती थी कि साक्षी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। उसे लगता था कि अगर आज नहीं समझाया गया, तो कल देर हो जाएगी।
लेकिन साक्षी उस समय समझने के मूड में बिल्कुल नहीं थी।
उसने तुरंत जवाब दिया,
“मुझे पता है की मुझे क्या करना है क्या नहीं, इसलिए आप चुप ही रहो।”
उसकी बात सुनकर स्वाति कुछ पल के लिए शांत हो गई।
कभी-कभी सामने वाले का गुस्सा देखकर इंसान खुद को रोक लेता है, लेकिन जब बात अपने परिवार की इज़्ज़त और भविष्य की हो, तब चुप रहना भी आसान नहीं होता।
स्वाति ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की।
“हाँ मुझे पता है की तुम्हे सही गलत की समझ है, अभी पेपर आने वाले है तो उस पर ध्यान देने की बजाय तुम…. खैर छोड़ो, कम से कम पापा के बारे में सोचो, अपने भाई के बारे में सोचो, इनकी बदनामी तो मत कराओ, कितने मेहनत से पैसे कमाकर तुम्हारी पढ़ाई में लगा रहे है।”
कमरे के अंदर बैठा समर अब सब कुछ साफ-साफ सुन रहा था।
उसने अपने हाथ रोक दिए। कुछ पल तक वह कुर्सी पर बैठा रहा।
उसने सोचा…
“दोनों समझदार हैं। थोड़ी देर में मामला शांत हो जाएगा।”
लेकिन अगले ही पल उसे स्वाति की आवाज़ फिर सुनाई दी। इस बार आवाज़ पहले से ज़्यादा तेज़ थी।
समर ने गहरी साँस ली, अपना काम अधूरा छोड़ दिया और कमरे से बाहर निकल आया।
उसे देखते ही स्वाति ने राहत की साँस ली।
“अब आप ही समझाओ इसे।”
लेकिन साक्षी का गुस्सा अब तक ठंडा नहीं हुआ था। उसने बिना रुके कहा,
“देखो मुझे किसी से कुछ नहीं समझना और जो आप कह रही हो न की सारी कमाई मेरे पढ़ाई में लगा देते है तो ऐसा कुछ नहीं है, मैं अपने पापा के पैसे से पढ़ रही हूँ, और पापा ने ही तो इन्हें पढ़ाया है न, अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”
ये शब्द सुनते ही समर जैसे भीतर तक काँप गया।
उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही साक्षी है, जिसे उसने बचपन से गोद में खिलाया, जिसके लिए अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ छोड़ीं, जिसकी हर ज़िद पूरी करने की कोशिश की…
आज वही बहन उसके लिए “एहसान” शब्द का इस्तेमाल कर रही थी।
कुछ रिश्ते टूटते नहीं…
लेकिन एक वाक्य उन्हें पहले जैसा भी नहीं रहने देता।
समर कुछ कहना चाहता था। उसके होंठ खुले ही थे कि तभी स्वाति बोल पड़ी।
“देखो तुम्हे अपने भैया से इस तरह से बाते नहीं करनी चाहिए, तुम्हारी जुबान कुछ ज्यादा ही चलने लगी है, मेरी बहन होती तो अभी पीट कर रख देती।”
यह सुनते ही साक्षी का गुस्सा पूरी तरह फूट पड़ा।
उसने चुनौती भरे स्वर में कहा, “हाँ तो मारो न, मारो मुझे।”
इतना कहते हुए उसने स्वाति को ज़ोर से धक्का दे दिया। स्वाति अपना संतुलन नहीं संभाल सकी।
वह पीछे जाकर दीवार से टकरा गई। एक पल के लिए पूरा घर जैसे थम गया।
समर ने जब अपनी पत्नी को दीवार से टकराते देखा, तो उसके भीतर का धैर्य टूट गया। उसने बिना कुछ सोचे आगे बढ़कर साक्षी के गाल पर एक थप्पड़ मार दिया।
थप्पड़ की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
और उसी आवाज़ के साथ जैसे इस घर की शांति भी टूट गई। बाहर बैठे शेखर ने जैसे ही थप्पड़ की आवाज़ सुनी, वह तुरंत उठकर अंदर आया।
उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। बरामदे में पहुँचते ही उसने ऊँची आवाज़ में पूछा,
“क्या तमाशा बना रखा है तुम लोगो ने?”
समर जल्दी से बोला,
“पापा मैं बताता हूँ वो साक्षी ने स्वाति को…”
लेकिन शेखर ने उसकी बात पूरी होने ही नहीं दी।
उसने गुस्से में कहा,
“क्या सुनूँ मैं तुम्हारी, जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”
ये शब्द समर के सीने में किसी तीर की तरह जाकर लगे।
उसे उम्मीद थी कि पापा पहले पूरी बात सुनेंगे।
लेकिन फैसला तो उसकी बात पूरी होने से पहले ही सुनाया जा चुका था।
समर ने खुद को संभालते हुए कहा,
“पापा वो मेरी भी बहन है और उसने स्वाति के साथ बदतमीज़ी की, वो तो उसे बस समझा रही थी।”
शेखर का चेहरा और सख्त हो गया। उसने उँगली दिखाते हुए कहा,
“चुप एकदम चुप, आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा, अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट, आयी बात समझ में।”
यह पहली बार था…
जब समर को महसूस हुआ कि वह अपने ही घर में किसी पराए की तरह खड़ा है। जिस पिता ने कभी उसी पर भरोसा करके अपनी बेटी की जिम्मेदारी उसे सौंपी थी…
आज वही पिता उसे अपनी बहन से दूर रहने का हुक्म दे रहे थे।
समर ने एक बार साक्षी की तरफ देखा। फिर अपने पिता की ओर। उसने कुछ कहना चाहा…
लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।
कुछ रिश्ते आवाज़ से नहीं…
खामोशी से टूटते हैं।
वह बिना कुछ बोले अपने कमरे की ओर चल पड़ा।
उसके कदम भारी थे।
कमरे का दरवाज़ा बंद करते ही वह बिस्तर पर बैठ गया। कमरे में सन्नाटा था…
लेकिन उसके भीतर यादों का शोर उठने लगा था। उसे याद आने लगा…
एक समय ऐसा भी था, जब यही साक्षी उसकी दुनिया की सबसे प्यारी ज़िद हुआ करती थी…
जिसकी हर मुस्कान के लिए वह कुछ भी करने को तैयार रहता था…
और उसके पापा…
वो भी तब हर बात पर यही कहते थे—
“समर… अब तू ही इसे समझा सकता है।”
यादों का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा…
और समर का मन कई साल पीछे लौट गया…
भाग – 2 : यादों का आईना
कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही समर बिस्तर के किनारे बैठ गया। बाहर बरामदे में अभी भी धीमी-धीमी आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन उसके कान अब कुछ सुन नहीं रहे थे। शेखर के शब्द उसके भीतर हथौड़े की तरह गूँज रहे थे।
“जब से तेरी बीबी आई है न तब से तू मेरी बेटी का दुश्मन हो गया है।”
समर ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।
आँखें बंद होते ही वर्तमान की कड़वी सच्चाई धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगी और बीते हुए दिनों की मीठी यादें उसके सामने जीवित होने लगीं।
उसे याद आया… एक समय ऐसा भी था, जब इस घर में झगड़ों की जगह हँसी गूँजा करती थी। हर शाम इसी आँगन में सब लोग साथ बैठते थे। शेखर की डाँट में भी अपनापन होता था और साक्षी की जिद पूरे घर को मुस्कुराने पर मजबूर कर देती थी।
उसी समय की एक तस्वीर उसकी आँखों के सामने उभर आई।
रसोई से गरम-गरम खाने की खुशबू आ रही थी। खाने की मेज़ पर समर और साक्षी साथ बैठे थे। दोनों खाते कम और एक-दूसरे की खिंचाई ज़्यादा कर रहे थे।
साक्षी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए मुस्कुराकर कहा,
“भैया इस बार मेरे बर्थडे पर एक अच्छी सी ड्रेस दिलाएगा क्या?”
समर ने उसकी तरफ देखते हुए मुस्कुराकर पूछा,
“किस तरह की ड्रेस चाहिए बता।”
साक्षी की आँखों में चमक आ गई।
“कुछ अलग तरह की जो अभी तक नहीं पहनी, जैसे फिल्मो में पहनते है।”
समर ने जानबूझकर गंभीर चेहरा बनाया और बोला,
“ठीक है इस बार चुड़ैल वाली ड्रेस लाता हूँ वो तूने अभी तक नहीं पहनी है।”
बस फिर क्या था…
साक्षी ने तुरंत मुँह फुला लिया।
“भैया मजाक मत करो, मैं क्या चुड़ैल लगती हूँ, ठीक है भाभी को आने दो फिर देखूंगी उन्हें कौन से चुड़ैल वाली ड्रेस लाकर दोगे।”
इतना सुनते ही समर ज़ोर से हँस पड़ा।
साक्षी ने गुस्से का नाटक करते हुए रोटी का छोटा-सा टुकड़ा उसकी तरफ फेंक दिया।
दोनों की नोकझोंक देखकर शेखर भी मुस्कुरा दिए।
उस दिन घर की दीवारों पर केवल हँसी गूँज रही थी।
समर ने कभी महसूस ही नहीं किया था कि वही छोटी-सी लड़की, जो हर बात पर उससे रूठ जाती थी, एक दिन उसी से इतनी दूर हो जाएगी।
यादों का सिलसिला यहीं नहीं रुका।
एक और घटना उसके सामने चलचित्र की तरह घूमने लगी।
उस दिन दोपहर का समय था। समर घर पर बैठा कुछ काम कर रहा था। तभी उसका फोन बजा। उसने फोन उठाया और सामने वाले की पूरी बात सुनने के बाद केवल इतना कहा,
“ठीक है आने दो फिर बताता हूँ।”
फोन रखते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए। वह चुपचाप दरवाज़े की तरफ देखने लगा। कुछ देर बाद साक्षी घर के अंदर आई। उसे देखते ही समर ने पूछा,
“कहाँ थी अब तक?”
साक्षी ने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए कहा,
“कही नहीं भैया, वो सहेली के साथ थोडा रुक गयी थी इसलिए लेट हो गयी।”
समर उसकी आँखों को पढ़ रहा था।
उसे साफ महसूस हो रहा था कि साक्षी कुछ छिपा रही है।
उसने पास रखी एक छड़ी उठाई और गंभीर आवाज़ में कहा,
“सच बता कहाँ थी और क्या कर रही थी।”
साक्षी का चेहरा उतर गया। तभी बाहर से शेखर अंदर आए। उन्होंने दोनों को देखा और पूछा,
“क्या हुआ समर, क्या किया इसने?”
समर ने बिना कुछ छिपाए सारी बात बता दी।
“पापा इसी से पूंछो कहाँ थी अब तक, स्कूल से छुट्टी करके लड़को के साथ घूमने गयी थी, और किसी से झगड़ा करके आयी है।”
शेखर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
उन्होंने तुरंत कहा,
“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी, जितना छूट दिया है उतना ही बिगड़ जा रही है, और पूरी कर सारी फरमाइश।”
साक्षी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह रोते हुए बोली,
“सॉरी पापा वो मेरी सहेली ने बोला की चल आज तुझे अपने घर घुमा के लाती हूँ, उसके दोस्त थे तो वो रास्ते में लड़ाई करने लगे, मैंने कुछ नहीं किया।”
शेखर ने उसकी बात सुनी और बिना कुछ कहे वहाँ से चले गए। अब घर में केवल समर और साक्षी रह गए थे।
साक्षी सिर झुकाए खड़ी थी।
उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
वह धीरे से समर के पास आई और बोली,
“सॉरी भैया आगे से किसी के साथ नहीं जाउंगी।”
समर का गुस्सा उसी पल पिघल गया।
उसने छड़ी एक तरफ रख दी।
फिर साक्षी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला,
“ठीक है आज छोड़ रहा हूँ लेकिन आगे से अगर कुछ सुन लिया न तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।”
साक्षी ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया।
कुछ ही पल बाद उसने धीरे से समर का हाथ पकड़ लिया।
जैसे वह कह रही हो…
“मुझसे गलती हो गई भैया… लेकिन मुझसे नाराज़ मत होना।”
उस दिन समर ने उसे डाँटा ज़रूर था, लेकिन उस डाँट में एक बड़े भाई की चिंता थी।
और सबसे बड़ी बात…
उस दिन शेखर ने एक बार भी यह नहीं कहा था कि “मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”
उल्टा… उन्होंने खुद समर से कहा था,
“दो डंडे लगा अपने आप सब बताएगी।”
यही बात आज समर के दिल को सबसे ज़्यादा चुभ रही थी। आखिर ऐसा क्या बदल गया था?
वह तो आज भी वही भाई था… साक्षी भी वही बहन थी…
शेखर भी वही पिता थे…
फिर रिश्तों के मायने अचानक कैसे बदल गए? समर की आँखों से एक आँसू निकलकर उसके हाथ पर गिरा।
उसने धीरे से उसे पोंछ लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि दर्द इस बात का ज़्यादा था कि साक्षी बदल गई…
या इस बात का कि उसके अपने पिता बदल गए।
कमरे के बाहर रात गहराने लगी थी। लेकिन समर के भीतर यादों की सुबह अभी भी जाग रही थी। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि यह तो बस शुरुआत थी…
रिश्तों की असली परीक्षा अभी बाकी थी।
भाग – 3 : बदलते रिश्तों का दर्द
समर की आँखें अब भी खुली थीं, लेकिन उसकी नज़रें कमरे की दीवार पर टिकी हुई थीं। बाहर रात पूरी तरह उतर चुकी थी। बरामदे में फैला सन्नाटा बता रहा था कि झगड़ा तो खत्म हो गया है, लेकिन उस झगड़े की गूँज अभी भी घर की दीवारों में कैद थी।
उसी समय दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
स्वाति धीरे-धीरे कमरे के अंदर आई।
उसके चेहरे पर भी उदासी साफ दिखाई दे रही थी। दीवार से टकराने की वजह से उसके हाथ पर हल्की-सी चोट भी आ गई थी, लेकिन शायद उस चोट से ज़्यादा दर्द उसे समर की खामोशी का हो रहा था। कुछ पल तक दोनों बिना कुछ बोले बैठे रहे। खामोशी कभी-कभी शब्दों से कहीं ज़्यादा बोलती है।
आख़िरकार स्वाति ने धीरे से कहा,
“खाना लगा दूँ?”
समर ने बिना उसकी तरफ देखे ही कहा,
“भूख नहीं है।”
स्वाति उसके सामने आकर बैठ गई।
वह जानती थी कि समर भूख की वजह से नहीं, बल्कि अपने टूटे हुए मन की वजह से मना कर रहा है।
उसने धीमे स्वर में कहा,
“इतना मत सोचिए… जो हुआ उसे भूल जाइए।”
समर हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी हुई थी।
उसने पहली बार स्वाति की तरफ देखा और बोला,
“कैसे भूल जाऊँ?”
“जिस बहन को बचपन से अपनी बेटी की तरह संभाला… आज उसी के लिए मैं दुश्मन बन गया।”
कुछ पल रुककर उसने फिर कहा,
“और पापा…”
बस इतना कहकर वह चुप हो गया।
शायद उसके पास शब्द तो थे, लेकिन हिम्मत नहीं थी।
स्वाति उसकी मनःस्थिति समझ रही थी।
उसने धीरे से कहा,
“अब उन्हें समझाने का कोई फायदा तो है नहीं, करने दो जैसा उनका दिल करे, सुना नहीं पापा ने क्या कहा की मेरी बेटी को कुछ कहने की जरुरत नहीं है।”
समर ने गहरी साँस ली।
“यही बात तो समझ नहीं आ रही…”
“जब साक्षी छोटी थी, तब उसकी हर गलती पर पापा मुझे ही बुलाते थे। कहते थे— ‘समर, इसे समझा… इसे डाँट… इसे सही रास्ता दिखा।’ और आज…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“आज वही पापा कह रहे हैं कि मेरी बेटी को कुछ मत कहना।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कुछ देर बाद समर उठकर खिड़की के पास चला गया। बाहर आँगन में शेखर अब भी उसी कुर्सी पर बैठे थे। उनके चेहरे पर भी बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
समर उन्हें देखता रहा। उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—
“क्या सच में पापा बदल गए हैं… या फिर मैं ही बदल गया हूँ?”
उसे याद आया…
माँ के जाने के बाद इस घर में कितनी जिम्मेदारियाँ अचानक उसके कंधों पर आ गई थीं।
साक्षी तब बहुत छोटी थी।
स्कूल छोड़ने से लेकर उसकी किताबें खरीदने तक…
बीमार होने पर रातभर उसके सिरहाने बैठने से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ज़िद पूरी करने तक…
समर ने कभी यह नहीं सोचा कि वह उसका भाई है या पिता। उसे सिर्फ इतना पता था कि साक्षी खुश रहनी चाहिए। कई बार उसने अपनी जरूरतें टाल दी थीं, लेकिन साक्षी की जरूरत कभी नहीं टाली। जब पहली बार साक्षी ने साइकिल सीखने की ज़िद की थी, तब भी समर ही उसे मैदान ले गया था।
जब परीक्षा में कम नंबर आए थे, तब भी पापा के गुस्से से उसी ने उसे बचाया था। जब रात में बुखार आया था, तब भी पूरी रात उसी ने जागकर बिताई थी।
उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ कि वह कब भाई से बढ़कर उसकी जिम्मेदारी बन गई। लेकिन आज…
आज उसी बहन की जुबान से निकले शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहे थे—
“अगर थोड़ी बहुत मदद कर भी देते है तो कोई एहसान नहीं कर रहे है।”
समर ने आँखें बंद कर लीं।
कभी-कभी इंसान को परायों की बातें उतनी तकलीफ़ नहीं देतीं…
जितनी अपनों की एक बात दे जाती है। उसी समय बाहर से साक्षी के कमरे का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।
समर ने पलटकर देखा। वह कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखता रहा।
उसके मन में गुस्सा नहीं था। अगर कुछ था… तो केवल दुख।
दुख इस बात का कि जिस रिश्ते में कभी शिकायतें भी प्यार से खत्म हो जाती थीं, आज उसी रिश्ते में अहंकार ने जगह बना ली थी।
स्वाति उसके पास आकर खड़ी हो गई। उसने धीरे से समर के कंधे पर हाथ रखा।
समर ने उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
“स्वाति… क्या सच में शादी के बाद बेटा बदल जाता है?”
स्वाति ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
उसने बस इतना कहा,
“नहीं… बेटा नहीं बदलता।”
“बस कुछ लोगों की नज़र बदल जाती है।”
यह सुनकर समर कुछ नहीं बोला।
उसने एक बार फिर बाहर बैठे शेखर की तरफ देखा।
उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि इस घर में शुरू हुई यह दूरी आने वाले दिनों में रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा बनने वाली है।
रात और गहरी होती जा रही थी।
लेकिन इस घर के रिश्तों पर छाया अँधेरा अभी बाकी था…
भाग – 4 : एक ही छत, अलग-अलग दिल
रात किसी तरह बीत गई, लेकिन उस घर में किसी की नींद पूरी नहीं हुई।
समर देर रात तक करवटें बदलता रहा। कभी वह छत को देखता, कभी आँखें बंद कर लेता। लेकिन जैसे ही आँखें बंद होतीं, पापा के वही शब्द उसके कानों में गूँजने लगते—
“आइन्दा से मेरी बेटी को अगर कुछ भी कहा तो ठीक नहीं होगा। अगर डांटना है अपनी बीबी को डांट।”
उधर स्वाति भी जाग रही थी। वह कई बार समर से कुछ कहना चाहती थी, लेकिन हर बार उसके होंठ खामोश रह जाते। वह जानती थी कि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन पर शब्द नहीं, केवल समय मरहम लगा सकता है।
सुबह की पहली किरण के साथ घर में हलचल शुरू हो गई।
रसोई में बर्तनों की आवाज़ आने लगी। चाय की खुशबू पूरे घर में फैल गई, लेकिन उस खुशबू में अपनापन कहीं खो गया था।
समर रोज़ की तरह तैयार होकर बाहर आया। बरामदे में शेखर अख़बार पढ़ रहे थे। समर कुछ पल उनके सामने खड़ा रहा।
उसका मन हुआ कि वह आगे बढ़कर कहे—
“पापा… मेरी पूरी बात तो सुन लेते।”
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।
जिस इंसान ने बिना सुने फैसला सुना दिया हो, उसके सामने सफाई देने का क्या मतलब?
वह चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गया। स्वाति ने बिना कुछ कहे उसके सामने चाय रख दी।
दोनों की नज़रें मिलीं।
उन नज़रों में हजारों बातें थीं, लेकिन दोनों खामोश रहे। इतने में साक्षी अपने कमरे से बाहर आई।
उसने एक बार भी समर की तरफ नहीं देखा। जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।
वह सीधे शेखर के पास जाकर बैठ गई। शेखर ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा,
“अब ठीक है न बेटा?”
साक्षी ने धीरे से सिर हिला दिया।
समर यह सब देख रहा था।
उसने मन ही मन सोचा—
“कल गलती किसकी थी, यह शायद अब मायने ही नहीं रखता।”
कुछ देर बाद शेखर ने स्वाति की तरफ देखते हुए कहा,
“नाश्ता तैयार है कि नहीं?”
स्वाति बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।
पहले ऐसा नहीं था।
पहले शेखर मुस्कुराकर पूछते थे—
“बहू… आज क्या बनाया है?”
लेकिन आज आवाज़ में अपनापन नहीं, केवल औपचारिकता थी।
समर के लिए यह बदलाव नया नहीं था।
वह पिछले कुछ महीनों से यह सब महसूस कर रहा था।
बस… कल पहली बार यह बदलाव शब्दों में बदल गया था।
नाश्ते के दौरान पूरे घर में अजीब-सी खामोशी थी। पहले इसी मेज़ पर बैठकर हँसी-मज़ाक होता था। साक्षी कभी समर की प्लेट से पराठा उठा लेती, तो कभी उसकी चाय पी जाती।
और समर हर बार उसे डाँटने का नाटक करता। आज वही मेज़ चार लोगों के बीच बैठी चुप्पी को देख रही थी। नाश्ता खत्म करके समर उठने लगा।
तभी शेखर की आवाज़ आई।
“समर…”
समर के कदम रुक गए।
उसे लगा शायद पापा अब कल की बात करेंगे। शायद अब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ होगा।
वह मुड़ा। शेखर ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,
“ऑफिस जाते समय साक्षी की कॉलेज की फीस जमा कर देना।”
समर ने केवल इतना कहा,
“ठीक है पापा।”
बस…
इतनी ही बात हुई। न कल का जिक्र… न थप्पड़ का… न उस बहस का…
और न ही उस दर्द का, जो कल पूरे घर में फैल गया था।
समर ने अपना बैग उठाया और बाहर निकल गया। गली में चलते हुए उसे एहसास हुआ कि इंसान जब बाहर हारता है तो फिर भी लड़ लेता है।
लेकिन जब अपने ही घर में हारने लगे…तो लड़ने की ताकत भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती है।
रास्ते भर उसका मन अशांत रहा। ऑफिस पहुँचने के बाद भी उसका ध्यान काम में नहीं लगा। लैपटॉप खुला था, फाइलें सामने थीं, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार वही दृश्य घूम रहा था। साक्षी का स्वाति को धक्का देना…
उसका थप्पड़… और फिर…
शेखर का बिना कुछ सुने उसे दोषी ठहरा देना। उसने कुर्सी पर सिर टिकाया और गहरी साँस ली।
उसके मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—
“क्या अब मुझे सचमुच साक्षी को कुछ नहीं कहना चाहिए?”
“अगर कल वह कोई और बड़ी गलती कर बैठी… तब भी नहीं?”
“क्या बड़े भाई का रिश्ता केवल शादी तक ही रहता है?”
इन सवालों का जवाब उसके पास नहीं था।
लेकिन उसे इतना ज़रूर महसूस हो रहा था कि अगर आज वह चुप हो गया…
तो शायद आगे चलकर यह चुप्पी पूरे परिवार पर बहुत भारी पड़ेगी।
उसे नहीं मालूम था कि आने वाले दिनों में साक्षी की ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर पहुँचने वाली है, जहाँ उसे सबसे ज़्यादा उसी भाई की जरूरत पड़ेगी…
जिसे आज उससे दूर रहने की हिदायत दी गई थी।
और शायद…
तब तक बहुत देर हो चुकी होगी…
तो ये कहानी थी “पापा वो मेरी भी बहन है ” , आप लोगो को कैसी लगी अपना प्यार जरूर दे
लेखक & कवि – बीरेंद्र गौतम “अकेलानंद”
